लो जुम्मन मियां फिर मेरे घर आ धमके। इस बार कंधे पर नई रजाई लिए थे। मैंने देखकर पूछा, मियां रजाई के साथ! घर में झगड़ा हुआ है क्या? बोले, नहीं भाई, चौराहे पर एक नेता जी रजाई बांट रहे थे। एक हमें भी पकड़ा दी। हमने बहुत कहा कि हमें जरूरत नहीं, पर वह माने ही नहीं। भाई, आजकल तो जिस नेता को देखो, वह रजाई, कंबल, जैकेट आदि बांटने में लगा है। पता नहीं, कहां से उनमें दानवीर कर्ण की आत्मा आ गई। ये अब तक छिपे कहां थे? इनकी एकदम से आत्मा कैसे जाग गई? क्या करिश्मा हो गया?
मैने कहा, करिश्मा-वरिश्मा कुछ नहीं है। चुनावी साल है, तो वे बरसाती मेढ़क नजर आ रहे हैं। चुनाव खत्म होते ही वैसे ही गायब हो जाएंगे, जैसे गधे के सिर से सींग। वैसे चलो इसी बहाने जरूरतमंद को रजाई-कंबल और जैकेट मिल रहे हैं। रजाई, कंबल और जैकेट बनाने वालों को खूब रोजगार भी मिल रहा है। एक-एक जरूरतमंद के पास कई-कई कंबल, रजाई और जैकेट इकट्ठा हो गए हैं। कई साल तक उनका काम चलेगा। चुनाव कुछ दिन में खत्म हो जाएगा। सारे नेता गायब हो जाएंगे, किंतु इनके बांटे कंबल, रजाई और जैकेट कई साल तक जरूरतमंद को गर्मी पहुंचाएंगे।
जुम्मन मियां बोले, क्या जैकेट, कंबल, रजाई लेकर जनता उन्हें वोट नहीं देगी? मैंने कहा, मियां, ये कौन-से अपने घर से खर्च कर रहे हैं? वही पैसा तो इसमें लगा रहे हैं, जो जनता को बेवकूफ बनाकर बटोरा है। जनता जानती है कि चुनाव जीतने के बाद ये पांच साल तक उनके पास लौटकर नहीं आएंगे। अभी वे ताऊ जी और बाबा जी कहकर पांव छू रहे हैं। चुनाव जीतकर पहचानेंगे नहीं। जनता भी समझदार होती जा रही है। वह जानती है कि इन नेताओं की खाल अलग है, और चेहरा अलग। सो अभी मौका है कि जितना हो सके, बटोर लिया जाए, नहीं तो जब उनका मौका आएगा, तो वे जमकर लूटेंगे।
जुम्मन मियां बोले, ये नेता कुछ भी समझें। जनता है, सब जानती है। अच्छा क्या, बुरा क्या है? ये सब कुछ पहचानती है।