ईसा पूर्व पांचवीं सदी के अंत या चौथी सदी की शुरुआत में लिखे एक ग्रंथ डिसीजेज ऑफ वीमन में स्तन कैंसर के विकसित होने की प्रक्रिया समझाई गई है। यूनानी शहर अब्देरा की एक महिला की छाती के कैंसर से मृत्यु हो गई, वहीं गले के कैंसर से पीड़ित व्यक्ति डॉक्टर द्वारा ट्यूमर जलाने के बाद बच गया। पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व और चौथी शताब्दी की शुरुआत में डॉक्टर घातक ट्यूमर को ‘कार्किनो’ कहते थे, जो प्राचीन ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ है केकड़ा। कालांतर में लैटिन डॉक्टरों ने इस बीमारी को नाम दिया ‘कैंसर’, जो केकड़े को संदर्भित एक लैटिन शब्द है।
आखिर कैंसर का नाम एक जानवर पर क्यों रखा गया? इसकी एक व्याख्या यह थी कि कैंसर भी केकड़े की तरह आक्रामक है और जैसे केकड़े के पंजों में फंसकर निकलना मुश्किल होता है, उसी तरह कैंसर से बचना कठिन है। ग्रीक-रोमन काल में कैंसर की वजहों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। प्राचीन चिकित्सा सिद्धांत के अनुसार, शरीर में चार अवयव होते हैं- रक्त, पीला पित्त, कफ और काला पित्त। इन चार अवयवों में संतुलन स्वस्थ होने की निशानी है। अगर किसी व्यक्ति में काले पित्त की अधिकता है, तो माना जाता था कि वह कैंसर ग्रसित हो सकता है। शुरुआत से ही यह समझ बन गई थी कि शुरुआती चरण में कैंसर को ठीक किया जा सकता है। कुछ औषधियां ककड़ी, पत्ता गोभी इत्यादि से बनाई गई थीं, वहीं केकड़े की राख व आर्सेनिक से भी कैंसर को हराने के प्रयास किए गए।
ग्रीक-रोमन लोगों का मानना था कि रोगी को बार-बार उल्टी करा कर कैंसर को रोका जा सकता है। कैंसर वाले हिस्से को जलाने के भी प्रयास किए गए। पर कैंसर को लाइलाज ही माना गया। 5वीं शताब्दी में एक कुलीन महिला ने प्रार्थना की शक्ति से कैंसर ठीक करने का दावा किया, पर चिकित्सकों को भरोसा नहीं हुआ। पिछले 2,400 वर्षों में कैंसर को लेकर हमारे ज्ञान में बहुत बदलाव आए हैं। कैंसर 200 से भी ज्यादा प्रकार के होते हैं। ऐसे लोग भी प्रेरणा बने हैं, जो कैंसर प्रबंधन की बदौलत लंबे समय तक जीवित रहे। फिर भी अभी काफी शोध की जरूरत है।