अहा! क्या अनूठा दृश्य है। शरीर किसी और ताल में झूम रहा है, तो मन किसी और ही सुर में गा रहा है। ताल से ताल नहीं बैठ पा रही है, लेकिन वह गाल से गाल मिलाने को लालायित हैं। उनके कर कमल किसी और की कमर पर लिपटने को आतुर हैं। शब्द जुबान से अपना समर्थन वापस लेने की धमकी देते दिख रहे हैं। मानो सरकार गिराकर ही दम लेंगे। उम्र की तीखी ढलान पर वह किसी तरह खड़े हैं, लेकिन शरीर का विवादास्पद ढांचा लेकर भी वह गा रहे हैं-कदम से कदम मिला रहे हैं। अहा, देखो तो नब्बे वसंत को टच करने जा रहे राजनीति के इस पितृ पुरुष की जवानी अवध की धरती पर किस तरह कुलांचे भर रही है। उनकी चपलता देख युवा लोग विस्मित हैं। इस उम्र में भी क्या तेज है, क्या स्टेमिना है! उनकी लीला अपरंपार है। इतिहास गवाह है, जब-जब उनके कदम थिरकने को व्याकुल हुए हैं, तब-तब सुर्खियां जरूर बनी हैं।
हे ऊधौ, इस पितृपक्ष में यह बावला मन इन्हीं के गुण गा रहा है। वह प्रेम और उल्लास के प्रकटीकरण की राजनीति के पितृ पुरुष हैं। पितृपक्ष में जब कुछेक पार्टियां अपने पितृ पुरुषों का राजनीतिक तर्पण करने पर उतारू हैं, तब उनकी धमाकेदार एंट्री से कहानी में नया मोड़ आ गया है। ऐसे पितरों के आगे यह नतमस्तक होने का समय है। खबरों की धारा जो इधर-उधर आवारगी करती फिर रही थी, अपने अनूठे कौशल की बदौलत उन्होंने अपनी ओर मोड़ ली है। उनका मन मयूर नृत्य कर रहा है, वह भी सावन के बाद!
हे ऊधौ, इनके पौरुष के आगे सौ आसाराम कुर्बान। उन्हें तो परीक्षण कराने की भी जरूरत नहीं है। वह तो स्वयंसिद्ध हैं, बाकी उनका डीएनए सिद्ध कर ही चुका है। प्यार, दुलार, मिठास और रंगों का यह गजब कांबो है। बल्कि ये गुण तो उनके डीएनए में हैं। वह गुणों की खान हैं, कोयले की नहीं, जिनके आवंटन पर सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जाए।
इनका यह नया अवतार देखकर रहीम अपना पिछला बयान बदलने की इजाजत मांग रहे हैं। हे ऊधौ! अब वह जमाना तो रहा नहीं, जब मन एक ही हुआ करता था। उस परिस्थिति में मैंने कहा था कि ऊधौ, मन न भए दस बीस। तब आधुनिक भारतीय राजनीति की तरह विकल्पहीनता का संकट था। इकलौता मन वृंदावन के छोरे श्याम के संग चला गया था। पर अब सिचुएशन चेंज हो गई है। अब मन इनका भजन गाने को उतावला है।