काशी के राजा ब्रह्मदत्त का बड़ा पुत्र विरक्त स्वभाव का था। पिता की मृत्यु के बाद उसने अपने छोटे भाई को राजा नियुक्त किया और स्वयं वन में चला गया। कुछ वर्ष बाद उसके मन में राज करने की इच्छा जागृत हुई। छोटे भाइयों को पता चला, तो उसने आदर सहित राज्य की बागडोर उसे सौंप दी। राजा बनते ही उसके मन में राज्य-विस्तार की लालसा जगने लगी। उसने कई राज्यों पर चढ़ाई कर उन्हंे अपने राज्य में मिला लिया।
इंद्र ने जब देखा कि एक धर्मपरायण व्यक्ति माया के जाल में फंस गया है, तो उसने उन्हें सही रास्ते पर लाने का निर्णय किया। एक दिन ब्रह्मचारी के वेश में आकर उन्होंने राजा से कहा, मैं ऐसे तीन नगरों की यात्रा कर आया हूं, जहां अपार स्वर्ण एवं रत्नों के भंडार हैं। यदि वे नगर आपके हाथों में आ जाएं, तो आप अथाह संपत्ति के स्वामी बन जाएंगे। यह बताकर वह वापस लौट गए।
राजा ने सोचा कि ब्रह्मचारी ने नगरों के नाम तो बताए ही नहीं। उसने ब्रह्मचारी की खोज कराई, लेकिन उसका कोई पता नहीं चला। राजा की नींद उड़ गई। अपार संपदा की तृष्णा ने उन्हें रोगी बना दिया। एक दिन बोधिसत्व भिक्षा के लिए राजमहल पहुंचे, तो समझ गए कि रत्नों की लालसा ने उसे रोगी बना दिया है। उन्होंने कहा, आपको शारीरिक नहीं, मानसिक रोग है। धन की लालसा ने आपको रोगी बना दिया है। ब्रह्मदत्त ने उसी क्षण राजपाट त्याग दिया।