सोलह दिसंबर, 2012 की रात दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या पर आधारित ब्रिटिश फिल्म निर्माता लेसी उड्विन द्वारा तैयार डॉक्यूमेंटरी, 'इंडियाज डॉटर' पर भारत में प्रतिबंध लगा दिया गया है। प्रतिबंध के इस फैसले पर देश भर में पुरुष और महिलाओं द्वारा तीखे सवाल उठाए गए हैं। प्रतिबंध के कारण इस डॉक्यूमेंटरी के प्रति देश भर में जैसी उत्सुकता जगी है, वह इस पर प्रतिबंध न लगाने की स्थिति में शायद इतनी न होती। लेकिन एक फिल्म या फिल्मकार की वजह से उस मुद्दे का महत्व कम कर देना दरअसल ज्यादा बड़े मु्द्दे से आंखें फेर लेना ही होगा।
'इंडियाज डॉटर' पर प्रतिबंध लगाने से पहले मैंने दिल्ली के एक होटल में यह डॉक्यूमेंटरी देखी। हजारों लोग बीबीसी यूके और यूट्यूब पर इसे देख चुके हैं। उन बलात्कारियों में से एक ने अपनी करतूत का औचित्य ठहराते हुए इस फिल्म में जिस तरह की टिप्पणियां की हैं, राष्ट्रीय मीडिया लगातार उसे फोकस कर रहा है। लेकिन इस कहानी का सबसे सिहरा देने वाला हिस्सा वह है, जिस पर हमने कम ही ध्यान दिया।
हर दिन, हर सप्ताह देश के नगरों, शहरों और गांवों की गलियों में लड़कियां और महिलाएं उपेक्षा और भेदभाव का सामना करती हैं। इनमें से बहुतों के साथ छेड़छाड़ होती है, बलात्कार होता है। इन घटनाओं में से कुछ ही सार्वजनिक होती हैं और अपराध की भयावहता बताने के संदर्भ में राष्ट्रीय सांख्यिकी का हिस्सा बनती हैं। लेकिन तमाम कवायदों, यौन हिंसा के खिलाफ प्रदर्शनों, कार्यशालाओं और सेमिनारों में हमारी दलीलों के बावजूद हम अपना संदेश एक सीमा से बाहर प्रसारित करने में सफल नहीं हो पाए हैं। ऐसे लोगों की संख्या बहुत है, जो औरतों पर होने वाले अत्याचारों को पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता के आईने में ही देखते हैं, और इनके लिए महिलाओं को ही दोषी ठहराते हैं।
सुस्त गति से चलने वाली हमारी अपराध न्याय प्रणाली इस समस्या को और बढ़ा देती है। निर्भया का मामला अब भी सर्वोच्च न्यायालय में अटका पड़ा है, और इसमें प्रगति नहीं हुई है। ऐसे में, यौन हिंसा के खिलाफ सार्वजनिक हताशा बढ़ती जा रही है; कई जगह भीड़ द्वारा न्याय करने और अपराधी को मार डालने के मामले भी आए हैं। भयभीत करने वाली बात दरअसल यह है, यह नहीं कि 'बाहरी आदमी' इस देश के बारे में क्या सोचता या कहता है।
हम कहां से शुरू करें? देश का मध्यवर्ग समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में अब भी सोच की दृष्टि से बंटा हुआ है। इसके अतिरिक्त लाखों लोग ऐसे हैं, जो रोजी-रोटी की जुगाड़ में ही इतने व्यस्त हैं कि उनके पास और किसी मुद्दे पर सोचने का अवकाश नहीं है। रोहतक स्थित नारीवादी जगमति सांगवान गांवों और शहरों की झुग्गी बस्तियों में लैंगिक संवेदना के अभाव की ओर इशारा करती हैं, 'इस इलाके में इस डॉक्यूमेंटरी के बारे में कोई बात नहीं कर रहा। यहां के लोग खबरों के पीछे नहीं रहते।जब भी उन्हें छुट्टी मिलती है, वे लोकल केबल टीवी पर फिल्में देखते हैं। स्कूलों में शिक्षकों पर समय का इतना दबाव रहता है कि वे पाठ्यक्रम पूरा करने के बारे में ही सोचते रहते हैं। यहां इन व्यापक सामाजिक मुद्दों पर कोई बात नहीं होती। ज्यादातर भारतीय परिवार रूढ़िवादी ढंग से सोचते पाए जाते हैं, इसलिए घर में इन मुद्दों पर बहस नहीं करते। देश की आबादी का बहुत छोटा-सा हिस्सा ही 'इंडियाज डॉटर' पर लगे प्रतिबंध पर बहस कर रहा है।'
लेकिन यह सवाल उन लोगों तक जाना ही चाहिए, जो चाहे अज्ञानतावश हो या दूसरी वजहों से, इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। और इस तरह के लोग समाज के हर स्तर पर हैं। केवल डिग्री हासिल कर लेने से या पास में पैसे आ जाने से कोई लैंगिक मामले में संवेदनशील नहीं हो जाता। यौन हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए पहले उस सोच को बदलना होगा, जो किसी लड़की या औरत को जलील करने, पीटने या बच्ची के साथ भेदभाव करने को गलत नहीं मानती।
इन कुछ आंकड़ों को ध्यान से देखें। दुनिया की हर तीन बालिका वधुओं में से एक भारत में है। कन्या भ्रूणहत्या यहां लगातार होती है। प्रति 1,000 लड़के पर 918 लड़कियों का अनुपात कोई अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता। हरियाणा को देश के समृद्ध राज्यों में से माना जाता है। लेकिन इस राज्य के पानीपत जिले में प्रति एक हजार पर लड़कियों की संख्या 837 है! और भी अनेक आंकड़े हैं, जो देश में लड़कियों और औरतों की खराब स्थिति के बारे में बताते हैं।
निर्भया से संबंधित इस वृत्तचित्र में लड़कियों के बारे में सबसे अपमानजनक टिप्पणियां उस दरिंदे की नहीं, बल्कि बचाव पक्ष के वकीलों की हैं, जिनमें से एक कहता है कि अगर उसकी अपनी बेटी ने मर्यादा का उल्लंघन किया होता, तो वह उसे जलाकर मार डालता। इस देश में कौन-सा कानून किसी सक्रिय वकील को ऐसी टिप्पणी करने की इजाजत देता है? मामला सिर्फ वकीलों का नहीं है। जो लोग वास्तविकता से परिचित हैं, वे तस्दीक करेंगे कि सार्वजनिक छवि के अनेक लोग पुरुषों से औरतों को कमतर मानते हैं, और यौन हिंसा के लिए उन्हीं को जिम्मेदार ठहराते हैं। इसके बावजूद उम्मीद कायम है, और देश के उसी हिस्से से है, जिसे आम या साधारण समझा जाता है। प्रगतिशील सोच के माता-पिता सिर्फ समाज के उच्च स्तर पर ही नहीं हैं। निर्भया के माता-पिता को ही देखिए।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उस जज्बे को सलाम करने की जरूरत है, जिसके तहत उन्होंने अपनी बेटी को पाला-पोसा। यह मौका उन दूसरे अभिभावकों का भी समर्थन करने का है, जो अपनी बेटियों के प्रति ऐसी ही प्रगतिशील सोच रखते हैं। तर्क और सोच की मशाल से अंधेरे समाज को रास्ता दिखाने का काम उनका ही है।