एक महिला होने के नाते यह एक अच्छा एहसास है, और दुख की बात है कि दिल्ली सहित कई शहरों में अपनी सुरक्षा को मैं हल्के में नहीं ले सकती, जहां मैं दशकों से रह रही हूं। व्यक्तिगत अनुभव से परे इसका बड़ा महत्व है। हालांकि इस समय भारत वैश्विक सुर्खियों में है और राष्ट्रों के समूह में भारत का वैश्विक दबदबा राष्ट्रीय उत्सव का कारण बना हुआ है, लेकिन अब भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां हम अन्य देशों से पीछे हैं, यहां तक कि विकासशील देशों की सूची में भी।
ऐसा ही एक प्रमुख संकेतक महिला कार्य भागीदारी दर है। बैंकॉक में घूमते हुए और यहां की महिलाओं को काम करते हुए देखकर मेरे मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि सुरक्षित सड़कों और सुरक्षित शहरों का क्या महत्व है। एक सुरक्षित शहर सिर्फ महिला-अनुकूल शहर नहीं होता है, बल्कि यह आर्थिक रूप से अधिक उत्पादक शहर भी होता है। आपको सुरक्षा के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सड़क सुरक्षित है और सार्वजनिक परिवहन है, तो आप और अधिक उत्पादक कार्य करते हैं।
विश्व बैंक के वर्ष 2021 के आंकड़ों के अनुसार, थाईलैंड में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी दर 59.2 प्रतिशत है। यकीनन यह पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी कम है, क्योंकि वर्ष 2011 में यह आंकड़ा 65.9 फीसदी था। कोविड-19 महामारी और उसके परिणामों के चलते बाल देखभाल केंद्रों और प्राथमिक विद्यालयों को बंद करने और बुजुर्गों और विकलांगता देखभाल को नियमित चैनलों से अलग करने से, थाईलैंड सहित दुनिया भर में लाखों महिलाओं की कार्यबल में हिस्सेदारी घट गई। लेकिन कामकाजी महिलाओं के मामले में थाईलैंड अब भी भारत से काफी आगे है।
भारत में महिला श्रमबल भागीदारी दर (एफएलएफपीआर) उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम रही है और समय के साथ इसमें गिरावट आती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप कामकाजी आयु वर्ग की महिलाओं की आबादी के अनुपात में कामकाजी महिलाओं में कमी आई है। विश्व बैंक के वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिला कार्य भागीदारी दर 28.3 फीसदी है।
किसी भी समस्या का कोई सरल उत्तर नहीं होता है, और ऐसे कई कारण हैं, जिनकी वजह से महिलाएं श्रमबल से बाहर हो जाती हैं या श्रमबल में प्रवेश करने से झिझकती हैं। लेकिन क्या हम सुरक्षित सड़कें बनाने में मदद करके ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को घरों से बाहर निकलने और श्रम शक्ति में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं? यही यक्ष प्रश्न है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली के परिवहन अनुसंधान एवं चोट निवारण केंद्र के साथ काम करते हुए राहुल गोयल नामक अनुसंधानकर्ता ने वर्ष 2023 के अपने शोधपत्र में शहरी भारत में घर से बाहर गतिशीलता में लैंगिक अंतर का पता लगाया। भारत में पृथकता या अलगाव ऐसा मानदंड है, जो महिलाओं की घर से बाहर गतिशीलता को प्रतिबंधित करता है। गोयल बताते हैं, 'हालांकि भारत में परिवहन साहित्य ने यात्रा की मांग में लैंगिक अंतर पर स्वायत्तता की
कमी के प्रभाव का पता नहीं लगाया है।'
शोधपत्र में आगे कहा गया है कि 'महिलाओं की गतिशीलता किशोरावस्था से युवा होने तक तेजी से कम हो जाती है और फिर बुजुर्ग उम्र में और भी कम होने से पहले से निम्न स्तर पर रही गतिशीलता काफी हद तक स्थिर हो जाती है। पुरुषों में ऐसी कोई भिन्नता नहीं देखी जाती है, सिवाय इसके कि बुजुर्ग पुरुषों की भी गतिशीलता कम हो जाती है। इसमें एक स्पष्ट विरोधाभास है कि महिलाएं ज्यादातर घर की गतिविधियों में भाग लेती हैं, जबकि पुरुष ज्यादातर घर से बाहर की गतिविधियों में शामिल होते हैं। किशोरावस्था या वयस्कता, विवाह, एक या अधिक घरेलू सदस्यों के साथ रहना, घर में एक शिशु का होना, कम आय और कम शिक्षा महिला गतिशीलता की कम संभावना से जुड़े हैं।' जैसा कि गोयल कहते हैं, 'अगर महिलाएं बाहर नहीं जा सकती हैं, तो यह गतिविधियों में शामिल होने के उनके विकल्पों को सीमित कर देता है।'
क्या सुरक्षित शहरों और सुरक्षित सड़कों से इस पर कोई फर्क पड़ेगा? हमें इस पर ध्यान देने की जरूरत है। जघन्य निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले के एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद से भारत में कई राज्य सरकारों ने शहरों और सड़कों को महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए कदम उठाए हैं। लेकिन अब भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। चेन्नई शहर में महिलाएं, जो रात 10 बजे से सुबह 7 बजे के बीच काम से लौटती हैं, सुरक्षित रूप से अपने निवास तक पहुंचने के लिए पुलिस गश्ती वाहन का उपयोग कर सकती हैं।
तमिलनाडु पुलिस ने रात में अकेले यात्रा करने वाली महिलाओं की मदद के लिए एक नई महिला सुरक्षा योजना की शुरुआत की है। यह योजना इसलिए शुरू की गई है, क्योंकि बहुत-सी महिलाएं अलग-अलग पालियों में काम कर रही हैं और कभी-कभी कार्यालय के वाहन द्वारा उन्हें ऐसी जगह छोड़ दिया जाता है, जहां से उन्हें अपने घर तक अकेले चलना पड़ता है। हमें ऐसी और पहल की जरूरत है।
महिलाओं को श्रम बाजार में प्रवेश करने और अच्छे काम तक पहुंचने के लिए कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। और यही नहीं, असमान रूप से उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बैंकॉक में मैंने जो देखा है, उसके अनुसार एक सुरक्षित शहर बनाना महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ाने में मदद कर सकता है, जो अधिक से अधिक महिलाओं को घर से बाहर निकलकर काम करने में सक्षम बनाएगा। इससे अर्थव्यवस्था भी ऊपर उठेगी।