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निजी जीवन से अलग है संसद

Sat, 16 Aug 2014 08:03 PM IST
कुमार प्रशांत
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हमें कितनों के, कितनी तरह के अपमानों की फिक्र है। प्रधानमंत्री का अपमान, राष्ट्रपति का अपमान, राष्ट्र का अपमान, अंबेडकर का अपमान, गांधी का अपमान ...जाने किस-किस का। जब भी हमें किसी के अपमान की बू आती है, हम सन्नद्ध हो जाते हैं। मुट्ठियां बंध जाती हैं, आवाज ऊंची हो जाती है और हमारी प्रतिबद्धता इतनी पक्की हो जाती है कि हम यह भान भी नहीं रखते कि उनका अपमान बचाने की रौ में हम कितनों का अपमान करते जा रहे हैं। ऐसा ही अभी हो रहा है। संसद में शोर हुआ है कि सचिन तेंदुलकर ने संसद का अपमान किया है। बात इसलिए उठी कि राज्यसभा में हमेशा अनुपस्थित रहने वाले सचिन तेंदुलकर ने अब अपने अनुपस्थित रहने की बाजाप्ता अनुमति मांगी। अनुपस्थित रहने का उनका आवेदन स्वीकृति के लिए पेश हुआ, तो कई सदस्य उखड़ गए। छह साल की अवधि के लिए राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हुए हैं सचिन तेंदुलकर जिसमें से दो वर्ष की अवधि बीत चुकी है। इन दो वर्षों में वह तीन दिन राज्यसभा में दिखाई दिए।
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सदस्यों का कहना है कि उनका ऐसा रवैया आपत्तिजनक है और यह संसद का अपमान है। सूचना के अधिकार का कोई सिपाही यह जानकारी भी निकाल ही लाएगा कि इसी अवधि में सचिन कितनी बार, कितने-कितने दिनों के लिए दिल्ली आए; और शायद यह भी कि वह किन कामों से दिल्ली आए। और तब कहा ही जाएगा कि अपने फायदे के हर काम के लिए आप दिल्ली आते हैं, लेकिन संसद में आने का आपको समय नहीं मिलता है। इस शिकायत में दम है। सचिन इसका कोई जवाब नहीं देंगे, क्योंकि जवाब नहीं देना उनका तरीका है। जब वह क्रिकेट के मैदान में सक्रिय थे, तब वह किसी भी बात या आरोप का जवाब अपने बल्ले से देते थे और इस तरह देते थे कि पूछने वाले के होश फाख्ता हो जाते थे। लेकिन राज्यसभा क्रिकेट का मैदान तो है नहीं। फिल्म अभिनेत्री रेखा का हाल भी कुछ ऐसा ही है, हालांकि वह सचिन से ज्यादा बार राज्यसभा में आईं हैं। जब सचिन को लेकर विवाद तेज हुआ, तो रेखा तुरंत ही राज्यसभा में पहुंचीं।

अब हम सवाल का दूसरा पहलू देखें। सचिन या रेखा या लता या हुसैन या रविशंकर या ऐसे ही दूसरे सितारों को राज्यसभा में लाने के पीछे सोच क्या है? संविधान की सोच यह है कि राष्ट्र-जीवन की ऐसी हस्तियां, जो विशिष्ट हैसियत रखती हैं, लेकिन दलीय रास्ते से, चुनाव आदि में उतर कर संसद में आने को तैयार नहीं होंगी, उनकी सूझबूझ का इस्तेमाल देश कर सके, इसकी एक अलग व्यवस्था हो। संविधान यह विवेक करने की जिम्मेवारी हम पर छोड़ता है कि हम किनके लिए इस सुविधा का इस्तेमाल करते हैं। क्या कभी किसी ने सचिन तेंदुलकर को राष्ट्रीय महत्व के किसी सवाल पर कोई राय प्रकट करते सुना है? क्या ऐसा भी कभी पता चला है कि वे गेंद-बल्ले के अलावा भी किसी जिम्मेवारी से अपनी संलग्नता महसूस करते हैं? क्या भारतीय क्रिकेट या भारतीय खेलों की ऐसी किसी समस्या के बारे में आप जानते हैं कि जिसके लिए सचिन ने अपनी गर्दन आगे की हो? सचिन कितने बड़े क्रिकेटर रहे हैं, यह बात किसी के कहने या दोहराने की नहीं है लेकिन अपने शानदार क्रिकेट करियर से और उसके ग्लैमर से लिपटे-चिपटे ही उनका जीवन गुजरा है। किसी को इस पर एतराज कैसे हो सकता है कि सचिन ने अपने लिए यह जीवन-शैली चुनी।
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लेकिन समझदारी भरी ईमानदारी का तकाजा यह था कि सचिन को इस पर एतराज होना चाहिए था - गहरा एतराज - कि कोई उनके इस असंलग्न जीवन का अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करे। कांग्रेस ने यही किया। सचिन जब से सदस्य बने हैं, तब से रोज ही राज्यसभा में आते होते तो क्या राज्यसभा की और राज्यसभा में उनकी उपादेयता बढ़ जाती? क्या सचिन राज्यसभा में दिखाई दिए, इससे उनकी सदस्यता का औचित्य साबित होता है? राज्यसभा की सदस्यता का कांग्रेसी प्रस्ताव स्वीकार कर सचिन ने खुद ही अपना अपमान किया। सचिन क्रिकेट के मैदान में जितनी बड़ी हस्ती बने, उतनी ही बड़ी उनकी हस्ती देश-समाज में भी होती अगर वह अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रख पाते और राज्यसभा की सदस्यता या कि भारत-रत्न जैसे सम्मान से, ससम्मान खुद को अलग कर लेते।

ऐसा वह इसलिए करते, क्योंकि देश के राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक आदि सवालों के बारे में जहां चर्चा-मशविरा होता हो वहां बैठने की बुनियादी योग्यता उनकी नहीं है। संसद का दूसरा अपमान कांग्रेस पार्टी ने किया। उसने सचिन और ऐसे ही दूसरे लोगों को भी राज्यसभा में मनोनीत करवाया, जिनकी वहां कोई भूमिका बनती ही नहीं है। रेखा राज्यसभा में आकर कहेंगी क्या और करेंगी क्या? राज्यसभा में उपस्थिति का जो भत्ता मिलता है और जिस कारण अधिकांश सदस्य वहां मौजूद होते हैं, वह भी सचिन या रेखा के लिए किसी मतलब का नहीं होगा; मतलब यह कि वे उसके लिए ही राज्यसभा में हाजिरी नहीं देंगे। और जवाब कहीं-न-कहीं राष्ट्रपति को भी देना चाहिए कि क्या ऐसे मामलों में भी वह सिर्फ अंगूठा लगाने को विवश हैं?
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