एक वक्त ऐसा था, जब अपने काफिले पर फूलों की बारिश न होने पर नेता मान लेता था कि अब वह लोकप्रिय नहीं रहा। फिर वह वक्त भी आया कि जब तक नेता पर जूता नहीं उछलता था, तब तक वह बेचारा जनता के फीडबैक के लिए तरस जाता था। दिल में हमेशा यही धुकधुकी लगी रहती थी कि कहीं दिन तो नहीं लद गए। पर जूता उछलते ही वह जान जाता था कि वह अभी प्रासंगिक है।
जूते को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्रदान करने में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के योगदान को इतिहास अवश्य ही स्वीकार करेगा। जैसे आजकल नेट पर कुछ भी वायरल हो जाता है, उसी तरह कभी बुश साहब पर उछला जूता वायरल हो गया था। फिर नेताओं पर ऐसे धड़ाधड़ जूते उछलने लगे थे कि उसका असर अभी तक बना हुआ है। नेता पर जूता उछलते ही उसके चमचे तनावमुक्त और भक्तगण आह्लादित हो उठते थे और यह प्रचारित करने में जुट जाते थे कि अब कोई उनके नेता के महत्व को खारिज नहीं कर सकता। इधर दिल्ली में झाड़ूवालों ने तो एक ऐसे ही जूतामारक को अपना उम्मीदवार बना दिया है।
लेकिन अब वक्त स्याही का है। स्याही कभी रोशनाई होती थी, लेकिन अब यह अपने विरोधियों पर कालिख मलने के काम आती है। दरअसल कालिख तो अब मिलती नहीं है। वह लोगों के मन में जमकर बैठ गई है। फिर बॉलपेन और जेलपेन के जमाने में स्याही का कोई इस्तेमाल ही नहीं रह गया है। इसीलिए लोग कालिख की तरह इसका इस्तेमाल करने लगे हैं। हालांकि जिनके चेहरों पर स्याही की कालिख मली जा रही है, वे इसे सम्मान की तरह ले रहे हैं। हालांकि शर्त यह है कि स्याही नेता जी के मुंह पर मली जाए। स्याही मलने वाले भी यह सच जानते हैं, इसलिए वे सीधे नेताजी के मुंह पर ही स्याही मलते हैं। उस नेता को भी यथासंभव इसमें सहयोग करना चाहिए, नहीं तो स्याही किसी दूसरे के मुंह पर मली जाएगी और वह टापता रह जाएगा।
ये स्याही की कालिख से रोशन होने के दिन हैं। इससे स्याही का रुतबा भी अचानक बढ़ गया है।