देश में हर प्रकार के वाहनों की बिक्री में वृद्धि के बीच गैरजिम्मेदार तरीके से वाहन चलाने के कारण सड़क दुर्घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष सड़क हादसों में देश में एक लाख सत्तर हजार से ज्यादा लोग मारे गए और पांच लाख से अधिक घायल हुए। गाड़ी चालकों की दायित्वहीन मानसिकता तो पैदल चलने वालों के प्रति दिखती ही है, बड़ी गाड़ी वाले का छोटी गाड़ी वाले के प्रति हिकारत भाव भी दिखाई देता है।
यह दुखद है कि विश्व की सर्वाधिक रक्तरंजित हमारी सड़कों पर प्रति घंटे औसतन 15 लोग मारे जा रहे हैं, जबकि विकसित देशों में यह संख्या महज दो से तीन है। गाड़ियों के अनुपात के अनुसार विकसित देशों में प्रति 1,000 वाहनों पर प्रति वर्ष चार से 10 दुर्घटनाएं होती हैं, जबकि अपने यहां 35 दुर्घटनाएं होती हैं। विश्व में विगत वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में 14 लाख लोग मारे गए, जिसका 11 फीसदी हिस्सा अपने देश का था। जबकि बाढ़ या अन्य आपदा या अन्य तरह की दुर्घटना से होने वाली मौतों में नौ फीसदी हिस्सा भारत में होने वाली मौतों का है।
सबसे जोखिम भरी यात्रा दोपहिया वाहन की है। सड़क दुर्घटनाओं में 40 प्रतिशत दोपहिया चालक ही मारे जाते हैं। कुल वाहनों में दोपहिया वाहनों का हिस्सा 71 प्रतिशत और सड़क दुर्घटनाओं में 20.2 प्रतिशत है। बिना हेलमेट वाहन चलाने को कैसे रोका जाए, इस पर विचार होना ही चाहिए।
अभिभावकों की दायित्वहीनता के चलते कम उम्र के स्कूली बच्चे, दोपहिया वाहनों से विद्यालय आते-जाते हैं। उनका यह कृत्य अभिभावक और अध्यापक दोनों देखते हैं, पर मौन साधे रहते हैं। अपने देश में ट्रैक्टरों के साथ जुड़ी ट्रॉलियां, स्थानीय स्तर पर तैयार कर ली जाती हैं। ट्रॉली निर्माण, ट्रैक्टर एजेंसियों द्वारा नियंत्रित होने तथा इनका संचालन राष्ट्रीय राजमार्गों से इतर ग्रामीण मार्गों पर किए जाने से सड़क दुर्घटनाओं को कम किया जा सकता है।
दो पहिया और चार पहिया गाड़ियों की संख्या में लगभग 11 से 12 प्रतिशत और भारी वाहनों की संख्या में सात प्रतिशत की सालाना वृद्धि, सड़कों के विस्तार के बावजूद, जनसंख्या वृद्धि के दबाव में, मौत का कारण बन रही हैं। वर्ष 1951 में देश में वाहनों की संख्या 3.6 लाख थी, जो आज बढ़कर लगभग 12 करोड़ के आसपास हो गई है। अर्थात गाड़ियों की संख्या में 333 गुना वृद्धि हुई है, जबकि वर्ष 1950 में सड़क नेटवर्क की कुल लंबाई 3.98 लाख किलोमीटर थी, जो अब बढ़कर 33.2 लाख किलोमीटर हो गई है। अर्थात मार्गों की लंबाई में केवल 8.34 गुना वृद्धि हुई है।
अमूमन अभी तक अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं को रोकने की दिशा में कोई काम हुआ ही नहीं है। जो कंपनियां, एक से एक उम्दा गाड़ियां बाजार में उतारकर ग्राहकों में खरीदने का जुनून पैदा कर रही हैं, उनका पहला दायित्व, गाड़ी बेचने वाले व्यक्ति को बेहतर चालन प्रशिक्षण देना होना चाहिए। देश की एकमात्र कंपनी मारुति-सुजुकी ने कुल छह संस्थान खोले हैं।
शेष कंपनियां न तो ऐसा कर रही हैं और न हमारे पास उन्हें बाध्य करने का कोई कानून है। जब देश में सड़क दुर्घटनाओं से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तीन प्रतिशत नुकसान हो रहा हो, तब पाठ्यक्रमों में कक्षा छह से ही यातायात नियमों और सड़क संकेतों को पढ़ाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। केवल मोटर गाड़ी चालक के बजाय, सड़क उपयोग करने वाले, पैदल यात्री, रिक्शा, साइकिल, ठेला और बैलगाड़ी चालक का प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।
अपने यहां चालन लाइसेंस के पूर्व पर्याप्त प्रशिक्षण की अनिवार्यता नहीं है। परिवहन कार्यालयों में गाड़ी चलाने व जांच हेतु न तो मैदान हैं, न जरूरी साजो-सामान। वहां से लाइसेंस मिल जाना कुशल चालक होना नहीं है। ऐसे में इस दायित्व को विद्यालयी शिक्षा और गाड़ी उत्पादक कंपनियों के ऊपर डाला जाना चाहिए।
नित्य गाड़ियों की संख्या में वृद्धि करते जाना और सुरक्षा मानकों को न अपनाना, समाज को जोखिम में डालना है। कुशल चालक पैदा कर सड़क दुर्घटनाओं में 75 प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है। देखना यह है कि आर्थिक विकास के नाम पर केवल गाड़ियों के उत्पादन बढ़ाने के अलावा सड़क दुर्घटनाओं को कम करने की दिशा में भी कुछ किया जाता है या नहीं।