छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में माओवादियों ने सुरक्षाकर्मियों की जिस तरह हत्या की, उसका कोई भी समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि लोकतंत्र और हिंसा एक दूसरे के पूरक ही नहीं, बल्कि विरोधी भी हैं। राज्य के संचालन के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों को लाठीचार्ज, फायरिंग आदि के जो अधिकार दिए गए हैं, उनके पीछे भी कारण यही है कि जब ऐसी आक्रामक भीड़ का मुकाबला न किया जा सके, जिससे बड़े पैमाने पर जान-माल जाने का डर हो, तभी इन शक्तियों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे जब बस्तर गए, तब विभागीय प्रमुख होने के कारण उस हादसे पर उनका चिंता प्रकट करना स्वाभाविक ही था। पर गृह मंत्री ने वहां यह प्रतिज्ञा दोहराई कि हम माओवादियों से इसका बदला लेंगे। यह तो उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है कि बदले का स्वरूप क्या होगा, पर इससे यह सवाल जरूर पैदा हो गया है कि 'बदला' शब्द क्या सांविधानिक परिधि में आता है। जिनके पास व्यवस्था के संचालन का दायित्व है, क्या वे बदला लेने की बात सोच सकते हैं?
सच्चाई यह है कि राज्य किसी से बदला नहीं लेता, बल्कि दोषियों को दंड और पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने का भरोसा देता है। बदला शब्द तो सामंती युग का प्रतीक है, जिसका अर्थ यह होता था कि तुमने जितने लोग हमारी तरफ के मारे हैं, हम उससे अधिक लोग तुम्हारी तरफ के मारेंगे। बदला या प्रतिहिंसा को भारत की सांविधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक परंपरा का अंग नहीं कहा जा सकता। इसे गृह मंत्री के मुंह से भूल से निकला हुआ शब्द कहें या यह उनकी सोच और मानसिकता पर आधारित है?
गृह मंत्री रहते हुए एक बार पी चिदंबरम ने भी इसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की थी कि हम इसके लिए सेना का प्रयोग करेंगे, जिसका संसद में यह कहते हुए विरोध हुआ था कि सेना का इस्तेमाल देश के बाह्य दुश्मनों के लिए होता है, आंतरिक कानून-व्यवस्था के लिए नहीं। संकटकालीन स्थितियों में जब नागरिक व्यवस्था विफल हो जाती है, तब हम सेना को पुलिस की मदद के लिए बुलाते हैं। उस समय उन पर नियंत्रण सेना के नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारियों के ही चलते हैं।
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में नक्सलियों का आतंक बढ़ा है, लेकिन इसकी पड़ताल तो करनी पड़ेगी कि आखिर इसके मूल कारण क्या हैं, जिससे शांत, अविकसित और पिछड़ा आदिवासी इलाका उद्वेलित है। वहां कुछ राजनीतिक विचारों के लोग स्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके अपने तर्क हैं कि सदियों से हमारा शोषण हो रहा है और राज्य उन लोगों की मदद कर रहा है, जो हमारे परंपरागत अधिकारों, जमीन, जंगल आदि का अपने व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वहां अभी विकास पूरी तरह आरंभ ही नहीं हो पाया है, आने-जाने के मार्ग तक निर्मित नहीं हो पाए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य के मानकों का भी पालन नहीं हो पा रहा है। न्यूनतम मजदूरी कानून पर भी अमल नहीं हो रहा। सरकारी योजनाओं का ठेकेदार और अधिकारी अनुचित लाभ उठाने पर आमादा हैं। इसलिए क्षेत्रवासियों के गुस्से के कारणों के बजाय वह हिंसा ही हमें दिखाई पड़ती है, जो विकल्प के रूप में हो रही है। समाजशास्त्री कहते हैं कि इस क्षेत्र का त्वरित विकास और आदिवासियों की हालत में परिवर्तन के जरिये ही इस गुस्से को शांत किया जा सकता है।
यदि गृह मंत्री का बदला इस स्थिति में परिवर्तन के लिए है, तो उसका स्वागत करना चाहिए। लेकिन यदि बदला प्रतिहिंसा का द्योतक है, तो यह लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं है। उन्हें जवानों की रक्षा करनी चाहिए और इसके लिए आधुनिक साधन और सुविधाएं प्रयुक्त की जानी चाहिए।