पापा सो रहे हैं! टीवी की आवाज कम करो।
हमें भी पता है कि टीवी की आवाज कहां से आ रही है! खुद तो कमरे में टीवी फुल वॉल्युम पर चलाते हो, यहां हमें कम करने को कह रहे हो। पापा का ध्यान हमें भी है। और आपको कितना है, यह भी हमें पता है।
पता होता, तो टीवी बंद करके बैठते। क्रिकेट मैच में आवाज का क्या काम! कभी स्टेडियम में देखा है मैच? वहां कौन-सी कमेंटरी आती है। तुम्हारी बीवी आती है, तो सास-बहू के वो किलर-सीरियल लगा लेती है। ड्राइंग रूम नहीं हुआ, सिनेमा हॉल हो गया। अब आधी रात को तुम क्रिकेट लगाकर बैठ गए हो। हमारी चिंता मत करो, पर पापा का तो कुछ खयाल रखो।
पापा से हमारे रिश्ते इतने भी खराब नहीं कि तुम्हें कहने आना पड़े। लड़ने का कोई न कोई बहाना चाहिए तुम पति-पत्नी को तो।
मुझे कोई जरूरत नहीं है तेरे मुंह लगने की। वह तो पापा की फिक्र है। रात को टाइम पर नहीं सो पाते, तो पूरे दिन परेशान रहते हैं। मगर तुम्हें इससे क्या? खुद तो ग्यारह बजे के बाद उठते हो और आधी रात तक टीवी चलाते हो। कोई इतना मतलबी कैसे हो सकता है!
मेरा मुंह मत खुलवा! जब पापा एडमिट हुए थे अस्पताल में, तो मैं ही हर रात सोया था उनके पास! और मुझे कह रहा है कि मैं मतलबी हूं। काम पड़ता है, तो मैं ही काम आता हूं।
हम तो घर में बैठकर झूला झूलते हैं। तेरे जैसे नहीं हैं कि बार-बार अपने काम गिनाते रहें। पापा के तो एक भी संस्कार नहीं आए हैं। आ जाते, तो आदमी बन जाता।
अब तू हद पार कर रहा है। कहीं मेरा हाथ उठ गया, तो ठीक नहीं होगा।
मैंने भी चूड़ियां नहीं पहनी हैं। उठा ही दूंगा हमेशा के लिए। यह भी भूल जाऊंगा कि तू मेरा भाई था।
अरे...क्या हुआ स्कोर? देखो, शायद इंडिया जीत गया है। बाहर पटाखे फूट रहे हैं! आवाज तो बढ़ाओ जरा।
यह पापाजी की आवाज थी, जो कमरे से आंखें मिचमिचाते हुए बाहर आ रहे थे!