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मनुष्यता का धर्म: जिहादियों के हाथ से लिए जाए हथियार तभी इस्लाम होगा उदार

तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 23 Oct 2023 06:37 AM IST

सार

इस्लाम धर्म की कट्टर आलोचक होते हुए क्या मैं इसकी उम्मीद कर सकती हूं कि मुझे कभी मदरसा या मस्जिद का उद्घाटन कराने के लिए बुलाया जाएगा? ईदगाह मैदान में भाषण देने के लिए बुलाया जाएगा, ईद मनाने वाली कोई कमेटी मुझे सम्मानित करेगी? अव्वल तो इस्लाम धर्म के प्रतिनिधि कभी मुझे अपने यहां बुलाएंगे नहीं, लेकिन क्या उनका दिया गया सम्मान मैं कभी ग्रहण भी करूंगी?
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तस्लीमा नसरीन


जो लोग मुझे जानते हैं, वे यह भी बखूबी जानते हैं कि मैं हर धर्म की कट्टरता की आलोचक हूं। इसके बावजूद यह हिंदू धर्म की उदारता ही है कि मुझे दुर्गापूजा के आनंदमेले में जज की भूमिका में बुलाया जाता है, भोग प्रसाद पाने के लिए आमंत्रित किया जाता है, पूजा कमेटी की तरफ से सम्मानित किया जाता है। दूसरी तरफ, इस्लाम धर्म की कट्टर आलोचक होते हुए क्या मैं इसकी उम्मीद कर सकती हूं कि मुझे कभी मदरसा या मस्जिद का उद्घाटन कराने के लिए बुलाया जाएगा? ईदगाह मैदान में भाषण देने के लिए बुलाया जाएगा, ईद मनाने वाली कोई कमेटी मुझे सम्मानित करेगी? अव्वल तो इस्लाम धर्म के प्रतिनिधि कभी मुझे अपने यहां बुलाएंगे नहीं, लेकिन क्या उनका दिया गया सम्मान मैं कभी ग्रहण भी करूंगी?


मैं धर्म में विश्वास नहीं करती, मनुष्यता में विश्वास करती हूं। धर्म के नाम पर अगर किसी मनुष्य पर अत्याचार होता है, तो मैं उस मनुष्य के साथ खड़ी होती हूं, धर्म चाहे कोई भी हो। मैं मनुष्य और मनुष्यता के उत्सव में विश्वास करती हूं। दूसरे को नुकसान न पहुंचाए बिना जो धर्म का पालन करता है, उसके उस धर्म पालन के अधिकार के लिए मैं लड़ती हूं। मैं दुनिया भर में कला, संस्कृति का म्यूजियम जिस तरह देखती हूं, धार्मिक उपासनालय भी देखती हूं। स्पेन के अंदलुसिया में मैं सिर्फ मुस्लिम स्थापत्य देखने के लिए गई थी। धर्म कोई स्थापत्य नहीं बनाता, कलाकार स्थापत्य बनाते हैं। कलाकारों की कला मुझे मुग्ध करती है। यूरोप के म्यूजियमों में मैं रफायल, लियानार्दो द विंची, माइकल एंजेलो आदि की कलाकृतियां देखने गई हूं। प्राचीन रोमन देवी-देवताओं की मूर्तियां देखने गई हूं। केरल के कोच्चि में मैं बेबीलोन के यहूदियों का प्राचीन सिनेगग देखने गई थी। ठीक इसी तरह ओडिशा के कोणार्क और मध्य प्रदेश के खजुराहो में मैं मंदिरों का शिल्प और कलाकारी देखने जा चुकी हूं।


जाहिर है, अनेक मुस्लिमों को मेरा हिंदू मंदिरों में जाना पसंद नहीं। हालांकि अगर वे चाहें, तो मुझे इस्लाम से जुड़े आयोजनों से जोड़ने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं। अगर वे चाहेंगे, तो मैं विश्व इज्तेमा का फीता काटकर उद्घाटन कर सकती हूं, देवबंद के आयोजन की अतिथि बन सकती हूं, दीया जलाकर वाज महफिलों की शुरुआत कर सकती हूं। हिंदुओं के उत्सवों में हिंदू समुदाय के लोग जिस तरह मेरी सुरक्षा करते हैं, इस्लाम धर्म से जुड़े आयोजनों में मुसलमान खुद आगे बढ़कर मेरी हिफाजत करेंगे, यही तो मैं चाहती हूं।


इसमें किसी तरह का अहंकार नहीं है। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि देश-दुनिया के हर कोने में कट्टर मुसलमान ही मेरी सुरक्षा के लिए खतरा हैं। बांग्लादेश से मुझे बाहर निकालने में इन कट्टरवादियों का हाथ रहा, और यही लोग दशकों से मेरी उदार आवाज बंद करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। ऐसे में, इस्लाम से संबंधित आयोजनों में स्वाभाविक ही मेरी सुरक्षा को ज्यादा खतरा है। मैं तो चाहती हूं कि आम मुसलमान अपनी कट्टरता और सांप्रदायिक सोच से बाहर निकलकर आए। जो मुसलमान मुझे अपने धार्मिक आयोजनों में ले जाने की इच्छा रखते हैं, क्या वे मेरी सुरक्षा में ढाल बनकर खड़े रह सकेंगे?


नास्तिक होकर भी आज मैं हिंदुओं की दुर्गापूजा में शामिल हो सकती हूं, क्योंकि हिंदू धर्म जड़ नहीं है, यह उदार है। नास्तिक होते हुए भी मैं ईसाइयों के क्रिसमस उत्सव में शामिल हो सकती हूं, क्योंकि ईसाई धर्म उदार है और इसमें लगातार सुधार हो रहा है। लेकिन जो लोग मुसलमान नहीं हैं, वे लोग मक्का-मदीना शहरों में घुस ही नहीं सकते, मस्जिद में घुसने की तो बात ही छोड़ दें। किसी भी देश की किसी भी मस्जिद में नमाज के वक्त दूसरे धर्म के लोगों को प्रवेश करने देने की अनुमति नहीं है। इस्लाम इकलौता धर्म है, जो कहता है कि मुस्लिम के अलावा और कोई बहिश्त यानी स्वर्ग में नहीं जाएगा। इसका मतलब यह है कि जो मुसलमान नहीं हैं, सैकड़ों अच्छा काम करने के बावजूद उनके बहिश्त में जाने की संभावना नहीं है, क्योंकि वे मुसलमान नहीं हैं।


हालांकि इस्लाम धर्म में बदलाव हो रहा है। अनेक मुस्लिम देशों में तीन तलाक कहने से तलाक नहीं होता और बाल विवाह पर भी प्रतिबंध है। इंग्लैंड में एक नई तरह की मस्जिद है, जहां महिलाओं को भी इमाम बनने का अवसर मिलता है, और वहां महिला इमाम के पीछे खड़े होकर स्त्री-पुरुष नमाज पढ़ते हैं। लेकिन दूसरी ओर, इसी दौर में मुस्लिम कट्टरवाद ने आतंकवाद को जन्म दिया है। इस्लाम की छवि ऐसी बन गई है कि दुनिया में अनेक लोग आज इस्लाम कहने से आईएस, बोको हराम और अल कायदा के सदस्य समझते हैं। हालांकि मुस्लिम विश्व में प्रगतिशील लोग और प्रगतिशील तत्व हैं। मुस्लिम देशों की शिक्षा व्यवस्था से लेकर कानून तक से धर्म को अलग करने का गुरुतर दायित्व उन पर है। जब तक इस दायित्व का निर्वाह नहीं किया जाएगा, तब तक कट्टर इस्लाम का खतरा बना ही रहेगा।
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धार्मिक आस्था से ओत-प्रोत मेरी मां भी कुरान पढ़ती थीं, आईएस के लोग भी कुरान पढ़ते हैं। मेरी मां दया करने की बात कहती थीं, आईएस के सदस्य अपने विरोधियों को जिबह करते हैं। कुरान के अनेक हिस्से का अर्थ मेरी मां शब्दश: ग्रहण नहीं करती थीं, वह उन अंशों की सामयिक व्याख्या करती थीं। आईएस के लोग ऐसा नहीं करते। मेरी मां की तरह अनेक उदार और सहिष्णु मुस्लिम इस पृथ्वी पर हैं। लेकिन विडंबना यह है कि ऐसे लोग नेपथ्य में रहने के लिए अभिशप्त हैं। सतह पर हम जिस मुस्लिम समाज को देखते हैं, वह कट्टर और असहिष्णु ही ज्यादा है। मुस्लिम समाज को दूसरे धर्मों की तरह उदार बनाने के लिए जरूरी यह है कि जिहादियों के हाथों से हथियार छीन लिए जाएं। इस्लाम को शांति का धर्म बनाने का काम दुनिया की कोई सरकार नहीं करेगी। इसके लिए मुस्लिम समाज को खुद आगे होना होगा, ताकि लोग शिक्षित, संवेदनशील और उदार हो सकें।

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