इस्लामाबाद की एक प्रमुख सड़क से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित सदियों पुराना सैदपुर गांव सिर्फ पर्यटकों का पसंदीदा स्थल ही नहीं है, बल्कि मरगला पहाड़ी की तलहटी में बसे स्थानीय लोगों के लिए भी आरामगाह जैसा है। मैं जब कभी वहां स्थित किसी रेस्तरां में जाती हूं, तो सबसे पहले मैं वहां एक-दूसरे से सटे मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे में भी जाती हूं। सदियों से बेहद संरक्षित इन स्थलों पर अब इबादत नहीं होती, बल्कि ये स्मारक भर हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, 1580 ईस्वी में सैदपुर गांव में हिंदुओं की एक बड़ी आबादी रहती थी। कहा जाता है कि अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने एक बार इस गांव का दौरा किया था और यहां एक मंदिर बनवाया था। मंदिर की बगल में आवासीय भवन का भी निर्माण करवाया गया। गांव के चार तालाबों का नाम था-राम कुंड, लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड और हनुमान कुंड। इन तमाम धार्मिक स्थलों को छूना मुझे अच्छा लगता है और इन प्राचीन ढांचों पर उंगलियां फिराते हुए मैं हजारों वर्ष पुराने इतिहास की मानसिक यात्रा करने लगती हूं और कल्पना करती हूं कि कैसे विभिन्न धर्मों के लोग-पुरुष, स्त्रियां और बच्चे अपने-अपने पंथों में यकीन रखते हुए यहां इकट्ठा होते होंगे!
एक-दूसरे के धर्म के प्रति ऐसी सहिष्णुता इन दिनों दुर्लभ है। असहिष्णुता और परस्पर आदर की कमी ने ही हमारी जिंदगी को जटिल बना दिया है। मंदिरों, इमामबाड़ों, मस्जिदों और चर्चों पर हमले होते रहते हैं और पाकिस्तान से बाहर भी अल्पसंख्यकों के जबरन धर्म परिवर्तन की खबरें कोई पढ़ सकता है। एक दशक पहले जब मैं पहली बार मुंबई गई थी, तो मैं हाजी अली दरगाह के भीतर गई थी और यह देखकर हैरान थी कि गैर-मुस्लिम, खासकर स्त्रियां वहां सजदा कर रही थीं। एक धर्मनिरपेक्ष समाज से यह मेरा पहला साक्षात्कार था। लेकिन आज अगर पाकिस्तान और इस क्षेत्र के कई अन्य देशों की तरफ नजर डालिए, तो जो बात हमें सबसे ज्यादा दुखी करती है, वह यह कि कैसे सभी चीजें और सब लोग बदल गए हैं।
बेशक पाकिस्तान में आतंकवादियों और जिहादियों ने जीवन-शैली को बाधित किया है, लेकिन कभी-कभी यहां के युवाओं की आवाज भी सुनाई देती है, जो कहते हैं कि पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों को भी बराबरी का अधिकार है। पहली खबर इंजीनियर ज्ञानचंद के संबंध में आई, जो दलित हैं और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी से सीनेट की सीट के उम्मीदवार हैं। पिछले हफ्ते मीडिया में देश के विभिन्न शहरों और गांवों में होली मनाने की खबरें प्रकाशित हुईं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात सिंध विश्वविद्यालय में देखने को मिली, जहां हिंदू छात्रों को होली मनाने की मंजूरी नहीं दी गई। नेशनल स्टूडेंट फेडरेशन (एनएसएफ) ने कराची में स्वामी नारायण मंदिर के बाहर एक मानव शृंखला बनाई और उसके भीतर हिंदुओं ने होली मनाई। एनएसएफ के केंद्रीय आयोजक खुर्रम अली ने मीडिया को बताया, 'यदि सरकार अल्पसंख्यकों को संरक्षण नहीं देगी, तो लोग खड़ा होंगे ही।' आखिरकार यह वही देश है, जहां राणा भगवानदास पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश बनने वाले पहले हिंदू थे।
प्राचीन सैदपुर गांव की तरह सिंध प्रांत के थारपरकर शहर में एक गांव है मीठी, जहां बड़ी संख्या में हिंदू बसते हैं। हाल ही में हसन रेजा नामक लेखक ने मीठी गांव का दौरा किया था, वहां से वह ऐसी यादें लेकर लौटे, जिससे पता चला कि एक-दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान और सहिष्णुता का जो भाव सदियों पहले सैदपुर गांव में था, वह अब भी मीठी गांव में है।
एक गांव वाले ने हसन रेजा को बताया, 'यहां हिंदू और मुसलमान दशकों से एक साथ रहते हैं, और आज तक कोई धार्मिक विवाद नहीं हुआ है। मंदिरों में पूजा के वक्त लाउडस्पीकर पर अजान नहीं दी जाती और नमाज के वक्त मंदिरों में घंटियां नहीं बजतीं। रमजान के दौरान कोई भी सार्वजनिक रूप से खाना नहीं खाता और गांव का हरेक सदस्य होली खेलता है।' मीठी अपने नाम की तरह ही मीठा है। यहां करीब 80 फीसदी आबादी हिंदू है, पर दोनों धर्मों के लोग ऐसा कार्य नहीं करते, जिससे किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचे।
कुछ दिनों पहले कानून की पढ़ाई करने वाली मेरी भतीजी अपने मित्र अमरकोट के कुंवर करनी सोढ़ा की शादी में शरीक होने जयपुर गई थी। उनकी शादी ठिकाना कनोटा की पद्मिनी सिंह राठौर के साथ हुई। सीमा पार करने वाले पाकिस्तानियों के लिए यह देखना अनूठा अनुभव था कि भारत के एक हिस्से की सीमा पाकिस्तान के सिंध के इतने करीब है। इससे पहले कुंवर और पद्मिनी का टीका समारोह अमरकोट में हुआ था। 1947 के बाद यह पहला मौका था, जब पाकिस्तान में टीका समारोह हुआ था, हालांकि तबसे राजपूत शाही घरानों की कई शादियां सीमा पार हुई हैं। मैं यह जानकार चकित रह गई कि पाकिस्तानी दुल्हे की रिश्तेदारी मेरी एक मित्र सरिता कुमारी से है, जो अमरकोट से ही हैं और अब जयपुर में बस गई हैं। उसने बताया कि उसके दादा राणा अर्जुन सिंह को विभाजन के दौरान अमरकोट छोड़ भारत जाने के लिए कहा गया था, पर उन्होंने इन्कार कर दिया। वह मुस्लिम लीग में शामिल हो गए और कहा कि अपनी मातृभूमि छोड़ने की वह कल्पना भी नहीं कर सकते।
मैं जब यह कॉलम लिख रही थी, तभी यह खबर आई कि इराक में चरमपंथी गुट इस्लामिक स्टेट ने एक प्राचीन शहर पर हमला कर उसे तबाह कर दिया। इतनी हिंसा और घृणा किसलिए? सैदपुर से मीठी और अमरकोट से जयपुर तक, एक बार फिर यह देखा जा सकता है कि परस्पर सम्मान और सहिष्णुता की भावना कैसे स्मारकों और रिश्तों को जिंदा रखती है। हमारे क्षेत्र में कितनी आकर्षक कहानियां हैं! यह समय ही बताएगा कि पाकिस्तान में यदि असहिष्णुता का उपदेश देने वाले लोग सिर उठाएंगे, तो विवेक और सहिष्णुता के साथ उनका मुकाबला करने के लिए क्या और जोरदार आवाज उठेगी!