यह सभी जानते थे कि डेर्ना शहर बाढ़ की त्रासदी को लेकर संवेदनशील रहा है। वर्ष 1942 से अभी तक वहां पांच बार भयानक बाढ़ आई है। शहर को बाढ़ से बचाने के लिए बीती सदी के सातवें दशक में वादी-डेर्ना जलधारा पर दो बांध बनाए गए थे। इनमें से एक अल-बिलाद शहर से एक किलोमीटर दूर था। कोई 45 मीटर उंचाई के इस बांध की जलग्रहण क्षमता 15 लाख क्यूबिक मीटर थी। जबकि दूसरा बांध अबू मंसूर शहर से 13 किलोमीटर दूर था, जिसकी ऊंचाई 75 मीटर और जल ग्रहण क्षमता 2.25 करोड़ क्यूबिक मीटर थी।
गौरतलब है कि कर्नल गद्दाफी की सरकार के पतन के बाद लीबिया विभिन्न सशस्त्र गिरोहों की हिंसा का शिकार है और देश के दो हिस्सों में अलग-अलग लोगों का नियंत्रण है। ऐसे में बांधों के रख-रखाव की किसी को परवाह नहीं थी। दोनों बांध इस तरह बने थे कि एक के भरने पर दूसरा भरता था। त्रासदी के समय इनमें एक साथ इतना पानी आ गया कि पहले अल बिलाद बांध भर गया और उसके जल भराव ने पानी को पीछे की तरफ धकेला। उधर अबू मंसूर में पहले से पानी भरा था। वह इस रिवर्स प्रेशर से बिखर गया और दोनों कमजोर बांध एक आपदा में बदल गए। अभी लोग वहां साफ पानी न मिलने से मर रहे हैं, शहर में फैल रही लाशों की बदबू ने बीमारी और मौत के नए अध्याय लिख दिए हैं। वहां न तो अस्पताल हैं, न ही डॉक्टर या दवा। हर तरफ इंसान और जानवरों के शव सड़ रहे हैं।
वैसे इस तबाही को केवल जर्जर बांध के सिर नहीं मढ़ा जा सकता। भले अभी इस तथ्य को स्वीकारने में हिचकिचाहट हो, पर 24 घंटे में 16 इंच यानी कोई 411 मिलीमीटर बरसात जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव की तरफ भी इशारा है। सनद रहे कि जिन नदियों पर बांध हैं, वे आमतौर पर सूखी ही रहती हैं। मुसलाधार बरसात ने डेर्ना शहर को घेरे हुए पहाड़ों से ताकतवर जलधाराओं को तेजी से नीचे गिराने और जबर्दस्त भूमि कटाव का काम किया।
शुष्क जलवायु के कारण लीबिया में जंगल केवल 0.1 फीसदी है। लेकिन डेर्ना को पूर्वी लीबिया का उपजाऊ इलाका माना जाता है। यह हरा-भरा होने के साथ-साथ देश का सर्वाधिक पानीदार क्षेत्र भी है, जहां सालाना करीब 600 मिलीमीटर (24 इंच) वर्षा होती है। लेकिन दुर्भाग्य से विगत 10 सितंबर को एक ही दिन में इतना पानी गिर गया। इस शहर की स्थापना 15वीं शताब्दी में की गई थी। यहां अमेरिकी आए, फ्रेंच आए, इतालवी आए, और यह ब्रिटिश उपनिवेश भी रहा। तभी यहां सफेद रंग से पुते घर, ढेर सारे झरने, ताड़ के घने बाग के साथ सब्जी- फल के बड़े बागान हुआ करते थे। इलाके का सुंदर पर्यटन स्थल अब कीचड़, दलदल और रेत से पट गया है।
यह बात छिपी नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम, अचानक और तीव्र बारिश हो रही है। इस तरह की बारिश से भारत और दक्षिणी एशिया भी अछूते नहीं हैं। डेढ़ दशक पहले विश्व बांध आयोग चेतावनी दे चुका था कि बड़े बांध (खासकर 45 मीटर से ऊंचे) मानवीय जीवन के लिए बड़ी त्रासदी बनने जा रहे हैं। भारत में भी ऐसे कोई 28 बांध हैं, जिनकी निर्धारित उम्र बीत चुकी है और अब भी उनका इस्तेमाल हो रहा है। हमारे यहां हर साल बाढ़ से नुकसान होता है, जिसका एक कारण बांधों का पूरी क्षमता तक भर जाना और फिर उनके दरवाजे खोल देना है। यह सटीक समय है कि हम अपने बड़े बांधों को जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर आंकें, उनका प्रबंधन करें और भविष्य में सिंचाई और जल संचयन के लिए छोटी और पारंपरिक जल परियोजनाओं पर अधिक ध्यान दें।