अयोध्या की एक मस्जिद में पैंसठ वर्ष पूर्व रामलला के प्राकट्य और बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाईस वर्षों के बाद अब सुरक्षा के नए प्रबंधों में इसे ‘नो फ्लाइंग जोन’ में शामिल किया जाना है, क्योंकि अब खतरा धरती से अधिक आकाश से संभावित है। ऐसे में, नई सुरक्षा आवश्यकताओं की जरूरत पड़ गई है।
उल्लेखनीय है कि रामलला के प्राकट्य से लेकर 1984 तक अयोध्या में इसकी देख-रेख और सुरक्षा का दायित्व एक पतला डंडा लिए थाने का एक ऐसा सिपाही निभाता था, जिसका अन्य स्थानों पर कोई बड़ा उपयोग नहीं किया जा सकता था। लेकिन सुरक्षा को लेकर अब जो नई व्यवस्था की गई है, उससे सवाल उठता है कि रामलला विराजमान को आखिर खतरा किन कारणों से और किन तत्वों द्वारा संभावित हैं। वे देसी हैं या विदेशी? जब आसमानी हमले को हम अदृश्य खतरों में शामिल कर लेते हैं, तब क्या उसी तरह नहीं सोचते, जैसे कुछ लोग इस तरह की कल्पना करते रहते हैं कि अब सृष्टि का विनाश होने वाला है और अब कुछ भी नहीं बच पाएगा?
यह पूछना रामलला में आस्थाहीनता का ही परिचायक कहा जाएगा कि उनकी सुरक्षा को आकाश से खतरा किन सूचनाओं पर आधारित है। लेकिन जब इस विवाद का इतिहास देखा जाएगा, तब इसका भी विवेचन होगा कि इस संदर्भ में आईबी द्वारा दी गई रिपोर्टें ज्यादातर भ्रामक ही रही हैं। मसलन, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब अस्थायी मंदिर का निर्माण हो रहा था, तब प्रधानमंत्री सचिवालय के पास रिपोर्ट थी कि यदि इसमें व्यवधान डाला गया, तो दस हजार हिंदू अपने प्राण देकर इसका विरोध करेंगे। लेकिन तीसरी रात को पुलिस की एक छोटी टुकड़ी जब वहां कब्जा लेने गई, तो उसे लाठी-डंडा चलाने की भी जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि वहां जो थोड़े से लोग इस कार्य में लगे थे, वे केंद्रीय पुलिस बल को देखते ही भाग गए।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार इस नए निर्णय के जरिये क्या अयोध्या को वर्तमान स्थिति में भी अति संवेदनशीलता के घेरे में रखना चाहती है? कहीं यह संदेश देने की आवश्यकता तो नहीं पड़ गई है कि राष्ट्रद्रोहियों का खतरा तनिक भी कम नहीं हुआ है, इसीलिए अब नए प्रयत्नों की आवश्यकता है?
गौरतलब है कि रामलला विराजमान की छह इंच की मूर्ति के लिए सरकार तीन अरब रुपये से अधिक वार्षिक खर्च तो कर ही रही है। सुरक्षा के नाम पर अयोध्या को रेड, येलो और ग्रीन जोन में बांटा गया है। अयोध्या के ज्यादातर प्रमुख मंदिर येलो जोन में ही आते हैं, जहां पहुंचने के लिए व्यक्ति वाहनों तक का इस्तेमाल नहीं कर सकता और जहां राज्य और केंद्र के सुरक्षा बल की सक्रिय चौकसी तीर्थयात्रियों के लिए बाधक ही बनती है। तथ्य यह है कि सरकार बदलने के बावजूद इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया है।
यह कहा जा सकता है कि देश की सुरक्षा के लिए जिस प्रकार सेना का खर्च विवादों से परे हैं, उसी प्रकार रामलला विराजमान की सुरक्षा को भी खर्च के दायरे में नहीं देखा जा सकता। पर आस्था के मामले को खतरे के तौर पर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के भी अपने खतरे होते हैं। बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी भी अब यही कहते हैं कि उनकी अंतिम इच्छा यह है कि राम मंदिर का निर्माण हो ही जाए। पर आंदोलनकारियों की मुश्किल यह है कि मंदिर निर्माण इसके नाम पर होने वाली राजनीति को चोट पहुंचाएगा और इसकी हवा भी निकल जाएगी।