हंसती हूं सांस चैन की भरकर
अक्सर तो झेंप ही जगाती है मेरी अदम्य कामना
हूं मैं खड़ी खाली हाथ, एक आधुनिक जंगली,
जी-भर विक्षिप्त !
ले गए वे छीनकर वह सब जो तुमको दे सकती थी
प्रेम-पगे, आह्लाद से लहालोट वे सब रात-दिन
ढेर-ढेर सपने, अक्षय उम्मीदें
मगन मन प्रतीक्षा में
चौकस कि टूटे नहीं लय
उस प्रतिश्रुति की
जिसकी खातिर
तुम ही तुम, तुम ही!
लाख छुपाना चाहा राज मगर छलक गया!
एक अकेली औरत, चिंता में संग साथ की
अलट पलट हाथ देखती हूं मैं जैसे कि
वासना का यह परस ही हो मेरा अभीष्ट!
ऐसी मूरख है मरद जात
और जानती है
वह कितना कम-कम औरत को!
धीरे मैं अपने कदम टोहती हूं,
एक आधुनिक जंगली, जी-भर विक्षिप्त!
वापस है अपनी जगह पर
थकी हुई पट्टी- "अब कोई दस्तक नहीं"
अपनी मुस्कान का पिंजरा मैं खोलकर
हंसती हूं सांस चैन की भरकर ।
-रानू उनियाल
इंग्लैंड से पीएचडी और लखनऊ में अंग्रेजी की प्रोफेसर रानू उनियाल के दो कविता संग्रह अक्रॉस द डिवाइड और दिसंबर पोएम्स बेहद चर्चित रहे हैं। उनकी इस कविता का अंग्रेजी से अनुवाद हिंदी की सुपरिचित कवयित्री अनामिका ने किया है।