बंगलूरू की आई पेड-ए-ब्राइब नाम की बेवसाइट का अध्ययन बताता है कि कर्नाटक के सभी सरकारी विभागों में से पुलिस सर्वाधिक भ्रष्ट है। इस पोर्टल पर लोगों ने बताया कि वर्ष के शुरुआती ग्यारह महीनों में उन्होंने खाकी वर्दी को करीब नौ करोड़ रुपये रिश्वत दी। राज्य के 37 विभागों का यह अध्ययन बताता है कि यातायात विभाग दूसरा सर्वाधिक भ्रष्ट है, जिसे पुलिस विभाग से करीब 10 फीसदी कम रिश्वत मिली।
विडंबना है कि जिस दिन मैंने यह खबर अखबारों में पढ़ी, उसके एक दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था, जिसका शीर्षक था, द करप्शन ऑफ द पुलिस-इट्स कॉजेज ऐंड रेमेडीज। यह लेख 1845 के आसपास लिखा गया था। इसमें बताया गया है कि बंगाल में पुलिस अन्याय कर रही है। इस लेख में लेखक एफ पी स्कीपविद ने यह समझने की कोशिश की है कि औपनिवेशिक भारत में पुलिस इतनी भ्रष्ट क्यों है। क्या इसका कारण पुलिसकर्मियों का कम वेतन है, या रिश्वत लेकर वह अपनी आमदनी बढ़ाना चाहती है? स्कीपविद का जवाब नकारात्मक मिला है। उन्हें पता चला, ' पुलिसकर्मियों को सरकार के अन्य निकायों के भारतीय अधिकारियों के समान वेतन मिलता है। मगर उन पर चोरों के साथ मिले होने जैसे अविश्वासजनक बातें भी सुनी जाती हैं।'
19वीं सदी में बंगाल के ग्रामीण इलाके में पुलिस आमतौर पर जमींदारों के साथ मिली होती थी। अगर मजदूर कम वेतन या जमींदारों द्वारा जबरन काम लिए जाने का विरोध करते थे, तो पुलिस उस अन्याय को सुधारने के बजाय या तो उन्हें पीटती थी, या फिर जेलों में ठूंस देती थी। कुछ लेखकों ने दावा किया है कि अगर यूरोपीय लोग स्थानीय जमींदारों की जगह लेते, तो उत्पीड़न की यह प्रक्रिया खत्म हो चुकी होती। मगर स्कीपविद इससे सहमत नहीं हैं। बंगाल के जिन जिलों में नील की खेती होती थी, वहां यूरोपीय मूल के मालिक पहले से ही थे। उनका आचार-विचार भी स्वदेशी जमींदारों से बेहतर नहीं था। स्कीपविद उनके बारे में लिखते हैं, 'वे अपने समाज और अपने भाई-बंधुओं से कटे रहते थे और स्थानीय आचार-व्यवहार से रोग की तरह चिपके होते थे, जबकि उनकी क्रूरता और उत्पीड़न कई बार देसी जमींदारों को भी मात करता था।'
एफ पी स्कीपविद ने इस तर्क को खारिज किया कि कम वेतन और काली चमड़ी पुलिस भ्रष्टाचार का कारण था। लेकिन उन्होंने यह स्वीकारा कि नौकरी की असुरक्षा और अस्थिरता पुलिस की अक्षमता की सबसे बड़ी वजह थी। डीएम के एक नोटिस पर पुलिस कर्मचारियों का स्थानांतरण हो जाता था। और जहां तक 1940 के बंगाल की बात है, तो कोई भद्र आदमी इस तरह की नौकरी पसंद नहीं करता था, जिसमें उसका उच्च अधिकारी मामूली बात पर नाराज होकर उसका स्थानांतरण कर दे। लेकिन आज जो इस नौकरी में हैं, उनमें से अधिकांश की मानसिकता निम्न है। वे पुलिस की नौकरी करते ही इसलिए हैं कि जितनी तेजी से हो, अपनी जेब भर सकें। इस प्रक्रिया में अगर वे पकड़े जाते हैं, और उनका निलंबन होता है, तो वे दूसरे जिलों में दौड़ पड़ते हैं, जहां उनके अपराध के बारे में लोगों को मालूम नहीं है।
हालांकि आज भी पुलिस में भ्रष्टाचार का एक बड़ा कारण उनके नौकरी की असुरक्षा है। लेकिन जहां पहले उनका तबादला डीएम के आदेश पर होता था, वहीं आज उनकी तैनाती और स्थानांतरण का काम विधायकों और नेताओं के जिम्मे है। देश के कई राज्यों में पुलिस के खास पद खास कीमत पर बेचे जाते हैं। ये पद हासिल करने के लिए नेताओं को दिए गए पैसे पुलिस अधिकारी जनता से न सिर्फ वसूलते हैं, बल्कि जितनी जल्दी हो सके, वसूल लेने की कोशिश करते हैं। यह उनके भ्रष्ट आचरण का एक मुख्य कारण है।
पुलिस कर्मचारियों के भ्रष्ट होने की दूसरी वजह यह है कि उनके पास दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है। जहां राशन कार्ड अधिकारी और भू-पंजीयक नागरिकों को उनका हक देने में सिर्फ देर ही कर सकते हैं, वहां अतृप्त पुलिस वाले गिरफ्तारी और जेल में डालने जैसे कानूनी प्रावधान ले आकर नागरिकों को डरा सकते हैं। लेकिन पुलिस से जुड़ी समस्या सिर्फ भ्रष्टाचार तक नहीं है। अपने दैनंदिन क्रियाकलापों में लोग ध्यान देते होंगे कि ज्यादातर पुलिस कर्मचारियों में अपने कामकाज के प्रति कितनी जबर्दस्त अरुचि है। इसके अलावा उनमें फिटनेस का भी अभाव है-कम से कम देश के जिन हिस्सों को मैं जानता हूं, वहां पुलिस कर्मचारी मोटे होते हैं। दिल्ली पर केंद्रित राणा दासगुप्त की ताजा किताब में एक थाने का सजीव चित्रण है, जो 'सरकार की ताकत की सबसे जीर्ण-शीर्ण सीट है', जहां तार सॉकेट से निकले हुए हैं, दीवारों में छेद हैं, और जगह-जगह लगे स्टिकर कई और दूसरी चीजों के साथ 'सेक्सी हॉट बॉय' का विज्ञापन करते नजर आते हैं। इसी जर्जर जगह में हिंसा को अंजाम दिया जाता है।
1980 के दशक में पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स) ने पुलिस की क्रूरता, खासकर विचाराधीन कैदियों के प्रति क्रूरता, को बताते हुए रिपोर्टों की एक सीरीज छापी थी। मैं नहीं मानता कि उसके बाद से चीजें बदली हैं। अगर सबसे कम काम करने वाले सरकारी विभाग को सालाना पुरस्कृत करने का चलन हो, तो मेरा मानना है कि पुलिस विभाग को हमेशा ही यह पुरस्कार मिलेगा। कानून के हमारे रखवालों के बारे में बात करते हुए हमेशा ही भ्रष्ट, कभी प्रेरित न होने वाले, अनुपयुक्त और ढीले-ढाले जैसे शब्द हमारे जेहन में आते हैं।
बेशक, अपवाद भी हैं। अनेक पुलिस कर्मचारी ईमानदार, लक्ष्यबद्ध और योग्य हैं। ऐसे ही दो योग्य पुलिस अधिकारियों ने जब सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की, तो जज इनसे सहमत थे कि जिम्मेदारी के अभाव और पुलिस तंत्र के राजनीतिकरण के कारण ही देश भर में पुलिस बल के प्रति विरक्ति का भाव है। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के सात प्रक्रियागत चरणों का आदेश दिया, जिसकी शुरुआत वरिष्ठ पदों पर राजनीतिक नियुक्तियों को खत्म करने और किसी और के निर्देश पर मनमाने तबादलों रोकने से होनी थी। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव का अध्ययन बताता है कि ज्यादातर राज्यों ने शीर्ष अदालत के दिशा-निर्देश की अवमानना की।
इस महीने की शुरुआत में, गुवाहाटी में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने स्मार्ट पुलिसिंग की बात की; एस से स्ट्रिक्ट/सेंसेटिव, एम से मॉडर्न/मोबाइल, ए से अलर्ट/एकाउंटेबल, आर से रिलायबल/रेसपोंसिव, और टी से ट्रेंड/टेक्नो-सेवी। सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है कि इस पर अमल भी होगा। मीडिया में बीमा क्षेत्र में सुधार, श्रम कानून सुधार, बैंकिंग क्षेत्र में सुधार और रिटेल कारोबार में सुधार पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन आम आदमी के लिए पुलिस सुधार सबसे अधिक मायने रखता है।