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दिल्ली को बिजली का झटका!

Sat, 20 Dec 2014 08:09 PM IST
आशीष खेतान एवं वीके मित्तल
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यदि बिजली की कीमत इसी तरह बढ़ती रही, तो अगले पांच वर्षों में बिजली की दर ढाई गुना बढ़ जाएगी। दिल्ली के लोग अनिल अंबानी की कंपनी बीएसईएस और टाटा जैसी बिजली वितरक कंपनियों के 11,432 करोड़ रुपये के देनदार हैं, जिस पर प्रति वर्ष आठ फीसदी ब्याज भी लगता है। इसके अलावा, तकरीबन 1,500 करोड़ रुपये दिल्ली विद्युत नियामक आयोग द्वारा मंजूरी की प्रक्रिया में है। वर्तमान नीति और नियामक ढांचे में केवल तीन तरीकों से बिजली की कीमत को मौजूदा दरों पर बनाए रखा जा सकता है। या तो केंद्र सरकार वितरण कंपनियों को पैसा दे, या दिल्ली सरकार दे, और या फिर उपभोक्ता बढ़ी कीमत का भुगतान करें। दो वर्ष पहले जब शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने पहले विकल्प को अपनाने की कोशिश की थी, लेकिन विफल रहीं। उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से त्वरित ऊर्जा क्षेत्र सुधार योजना के तहत अनुदान उपलब्ध कराने के लिए कहा था। चिदंबरम ने यह कहते हुए अनुदान देने से इन्कार कर दिया था कि दिल्ली में ऊर्जा क्षेत्र का पहले से ही निजीकरण हुआ पड़ा है, जबकि यह योजना राज्य सरकारों के विद्युत बोर्डों के लिए है। दूसरा विकल्प तो शायद ही व्यावहारिक होगा, क्योंकि दिल्ली सरकार का वर्ष 2014-15 के लिए वार्षिक बजट मात्र 36,766 करोड़ रुपये है, जो वृहन्नमुंबई नगर निगम के बजट (31,178 करोड़ रुपये) से कुछ ही ज्यादा है। जाहिर है, दिल्ली सरकार के लिए यह बिल्कुल असंभव है कि वह बिजली वितरक कंपनियों के 13,000 करोड़ रुपये के कर्ज का भुगतान करे। ऐसे में एकमात्र विकल्प बचता है कि वितरक कंपनियां बिजली की कीमत को दो से तीन गुना बढ़ाकर अपने बकाये की भरपाई करें।
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कल्पना कीजिए कि अब से कुछ वर्षों बाद एक औसत मध्यवर्गीय परिवार करीब 500 यूनिट बिजली के लिए 5,000 रुपये के बिल का भुगतान करेगा। सवाल उठता है कि पिछली सरकारों ने वितरक कंपनियों के ऑडिट का आदेश क्यों नहीं दिया और बिजली उत्पादन की लागत को नियंत्रित क्यों नहीं किया? एक के बाद एक आने वाली सरकारों की ऊर्जा नीति को एक पंक्ति में परिभाषित किया जा सकता है-मुनाफाखोरों के लिए, मुनाफाखोरों का और मुनाफाखोरों द्वारा।

अब यह स्पष्ट हो गया है कि बिजली उत्पादकों ने कभी मुफ्त कोयले का लाभ उपभोक्ताओं को नहीं मिलने दिया। आयातित कोयले पर निर्भर बिजली उत्पादकों ने कोयला आयात का खर्च बढ़ा-चढ़ाकर दिखा कर, न केवल भारी मात्रा में रकम विदेश भेजी, बल्कि बिजली की बढ़ी कीमतें भी सुनिश्चित कीं। खनन, आपूर्ति और शोधन में लगी निजी कंपनियों ने खदान संचालन, परिवहन एवं कोयले की धुलाई की प्रक्रिया में काफी धन कमाया। इनके खिलाफ सीबीआई ने कई मामले दर्ज किए हैं, और सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट से भी खुलासा हुआ कि खनन, परिवहन और धुलाई की प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर कोयले की चोरी हुई। इस सबका खामियाजा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ा।
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डीईआरसी द्वारा पारित नवीनतम ऊर्जा कीमत कुछ चौंकाने वाली है। ऊर्जा उत्पादक जिन दरों पर दिल्ली की बिजली वितरक कंपनियों को बिजली बेचते हैं, वह 1.2 से लेकर 12.21 रुपये प्रति यूनिट है। जिस नए सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट को प्रतिस्पर्धी बोली के तहत कोल ब्लॉक आवंटित किया गया, वह 1.2 रुपये प्रति यूनिट की दर से दिल्ली को बिजली बेच रहा है। जबकि रिलायंस के स्वामित्व वाले इस संयंत्र ने बोली लगाते समय 1.196 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली बेचने की बात की थी। दूसरी तरफ केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम एनटीपीसी, जिसका कोल इंडिया के साथ कोयले को लेकर करार है, और जो दिल्ली की कुल बिजली खपत का 70 फीसदी आपूर्ति करता है, वह 1.75 से लेकर 6.15 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली बेचता है। बिजली विक्रय की कीमत में इस अंतर से साफ होता है कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो है।

असल में बिजली उत्पादक प्रशासन, कल्याण, अनुसंधान एवं विकास और रखरखाव के नाम पर अनुचित ऊपरी खर्च वसूलती हैं, जिसके चलते बिजली की कीमत बढ़ जाती है। विद्युत उत्पादक कंपनियों को नियंत्रित करने और उसका ऑडिट करने के लिए एक ज्यादा प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था वक्त की जरूरत है। इसके अलावा विद्युत नियामक आयोग में भी व्यापक सुधार की जरूरत है।
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आशीष खेतान एक खोजी पत्रकार और पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार रहे हैं।
वीके मित्तल राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान संगठन के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक हैं।
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