'औरतों का घूंघट करना सही है क्या?’ सवाल करती 15-16 साल की किशोरी के स्वर में जवाब जानने की उत्सुकता से ज्यादा चुनौती का भाव था। स्वाभाविक ही मैंने कहा, नहीं। पर्दा प्रथा को कैसे सही ठहराया जाए?यह तो एक किस्म का बंधन है।
प्रति प्रश्न हुआ, तो फिर हमारे गांव में सब इसे सही क्यों कहते हैं? टीचर से लेकर गांव के बड़े-बुजुर्ग इसके लिए दबाव क्यों डालते हैं? मिर्जापुर के मझवा ब्लॉक के रामचंद्रपुर गांव के जिस स्कूल में हम बैठे थे, वहां वह किशोरी अकेली नहीं थी। उसकी और भी तमाम सहेलियां थीं। उनके पास ढेर सारे सवाल थे- बाल विवाह सही है क्या? सही नहीं है, तो फिर हमारे गांव में लड़कियों के साथ ऐसा क्यों होता है? लड़कों को लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा सुविधाएं क्यों दी जाती हैं? क्यों हमारे स्कूल के टीचर ही हमसे कहते हैं कि ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करोगी? आखिर करना तो घर-गृहस्थी का काम ही है न। सरकार पता नहीं, क्यों तुम लोगों को पढ़ाने के लिए इतना परेशान है?
अनंत प्रश्नाकुलता!
हमें उम्मीद नहीं थी कि इस तरह सवालों की झड़ी लग जाएगी। सवाल, सिर्फ सवाल नहीं थे, प्रकारांतर से विद्रोह के स्वर थे। हम भौंचक्क थे। जिस स्कूल में हम बैठे थे, वहां तक पहुंचने के लिए न केवल कार को कई संकरी और कमजोर सड़कों से गुजरना पड़ा था, बल्कि आगे रास्ता और खराब होने पर हमें पैदल भी काफी दूरी नापनी पड़ी थी। इस गांव में बिजली दिन भर में चार-छह घंटे से ज्यादा नहीं आती। टीवी कुछ घरों में जरूर है, लेकिन दूरदर्शन से आगे की दुनिया इस बुद्धू बक्से के लिए अबूझ है। एकाध को छोड़कर किसी भी लड़की ने सिनेमा हॉल में कोई फिल्म कभी नहीं देखी। फिर भी वे शरमाई-सकुचाई लाजवंतियां नहीं, नए जमाने की आत्मविश्वास से लबरेज किशोरियां थीं। सोनी, अंजना, खुशबू, किरन, पूनम और पूजा...उनके ये नाम संज्ञा भर नहीं, नई उमंगों और बड़े सपनों के रूपक भी थे। अनायास याद आए भारतीय पुनर्जागरण के पुरोधा ईश्वरचंद्र विद्यासागर और राजा राममोहन राय। स्त्री शिक्षा के लिए पहल करने पर इन्हें किस कदर विरोध का सामना करना पड़ा था। और आज रामचंद्रपुर जैसे गांवों की किशोरियां सारी दुनिया मुट्ठी में करने का हौसला रखती हैं।
बातों का सिलसिला चल निकला, तो दूर तक गया। लोककथा, लोकगीत, कहानी और देश-समाज में आ रहे बदलावों से लेकर उनकी कल्पनाशीलता तक। हमने एक रेखाचित्र बोर्ड पर टांगा। इस चुनौती के साथ कि इसमें अपनी कल्पना के रंग भरो। चित्र को देखकर एक कहानी लिखो। दस, पंद्रह...अधिकतम बीस मिनट में इन बेटियों ने रेखाचित्र में उकेरी लकीरों को कागज पर शब्दों के माध्यम से जिंदा कर दिया। कहानियां बड़ी नहीं थीं, पर ये साबित करने को काफी थीं कि सोचने को खुला आसमान मिले, तो वे ऊंची उड़ान भरने को तैयार हैं।
दोपहर से शाम हो गई। सूरज ढला नहीं था, लेकिन उसकी तैयारी पूरी थी। अब उन किशोरियों को अपने घर लौटना था। आप फिर आएंगे न? किशोरियों के सवाल के पीछे छिपे आग्रह को पढ़ना बहुत मुश्किल नहीं था। हमने हां कहकर विदा ली।
अमर उजाला और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वाधान में किशोरियों के विकास के लिए चल रहे कार्यक्रम के तहत अगले दिन हम इलाके के दूसरे गांव में थे-रामापुर। फिर वैसा ही स्कूल और उत्साह से लबरेज वैसी ही किशोरियां। बाल विवाह, स्वच्छता, स्त्री शिक्षा जैसे सवाल फिर थे। कल्पनाशीलता की परख के लिए इस बार एक नया चित्र। नतीजे पहले से भी बेहतर। झमाझम बारिश स्कूल के उस कमरे के बाहर ही नहीं हो रही थी, मन भीतर से भी भीगा था-सत्ता या फिर उससे इतर भी, अहम ओहदों पर बैठे लोग कितना कम जानते हैं बेहद खामोशी से घट रहे इन परिवर्तनों के बारे में। दिल्ली के योजना भवन या फिर ऐसे ही तमाम आलीशान सरकारी दफ्तरों में बैठे अफसरों को शायद इस भारत की खबर भी नहीं है। होती, तो नए ढंग की योजनाएं बनाते। इनके सपनों को कहीं ज्यादा स्पेस की जरूरत है। सिलाई मशीनें और साइकिलें बांट देने से या फिर दो-चार स्कूल-कॉलेज खुलवा देने भर से इनकी महत्वाकांक्षा को पूरा नहीं किया जा सकता। शेयर बाजार का उछाल हो या जीडीपी का घटना-बढ़ना, अब महज दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों की ही फिक्र नहीं रह गई है। गांवों की किशोरियां भी उसके बारे में जानने-समझने लगी हैं। बात अचरज भरी लगती है, लेकिन है नहीं।