जातिगत भेदभाव के ऊपर लोहिया ने जो लिखा, उसे प्रशंसकों ने इकट्ठा कर उनके जीवनकाल में ही एक किताब के रूप में हैदराबाद से प्रकाशित कराया था। हालांकि वह किताब लंबे समय से अब प्रिंट में नहीं है, लेकिन एक स्वतंत्र प्रकाशक ने उसका संशोधित संस्करण जरूर निकाला। संयोग की बात यह है कि वह प्रकाशन संस्थान भी हैदराबाद में ही स्थित था। लोहिया ने अपने वामपंथी साथियों के बारे में लिखा था कि वे ईमानदारी से, लेकिन गलत तरीके से यह सोचते हैं। वे मानते हैं कि सिर्फ आर्थिक असमानता को खत्म करने के परिणामस्वरूप जातिगत असमानता अपने आप खत्म हो जाएगी। उन्हें आर्थिक और जातिगत असमानता रूपी राक्षस को खत्म करना था, पर वे इसे समझ पाने में असफल रहे।
लोहिया इस बात को बखूबी समझते थे कि भारतीय समाज में ‘जाति’ एक महत्वपूर्ण कारक है। जो लोग इसे सैद्धांतिक रूप से नहीं मानते हैं, वे इसे व्यावहारिक तौर पर इसे स्वीकार करते हैं। उन्होंने लिखा कि भारत में ‘जन्म, मृत्यु, विवाह, दावत जैसे अनेक अनुष्ठान’ जातिगत ढांचे के अनुसार ही चलते हैं। इस व्यवस्था को यह सुनिश्चित करने के लिए लागू किया गया था कि “ऊंची जातियों के लोग राजनीतिक और आर्थिक, दोनों तरह से अपना शासन बनाए रखें। वे अकेले इस व्यवस्था को बंदूक के दम पर नहीं चला सकते थे, इसलिए उन्हें उन लोगों में हीनता की भावना को भरना था, जिन पर वे राज करना चाहते थे या जिनका शोषण करना चाहते थे।”
यद्यपि लोहिया दलितों के विरुद्ध भेदभाव को नजरअंदाज नहीं करते। उनका ध्यान उन सवर्ण या उच्च जातियों पर केंद्रित है, जहां से राजनीतिक, प्रशासनिक, पेशेवर, व्यावसायिक और बौद्धिक अभिजात्य वर्ग आते थे और छोटी जातियों का सत्ता और उच्च पदों पर बड़े पैमाने पर प्रतिनिधित्व नहीं था। 1958 में उन्होंने लिखा था कि सवर्ण, भारत की आबादी के पांचवें हिस्से से भी कम हैं। इसके बाद भी वे राष्ट्रीय गतिविधियों, व्यापार, सेना, सिविल सर्विस या फिर राजनीतिक पार्टियों में आसानी से आ जाते हैं। राष्ट्र की प्रगति के लिए इस असंतुलन को सही करना होगा। लोहिया चाहते थे कि उनके साथी समाज के निचले वर्गों, जैसे कि महिलाओं, पिछड़ों , हरिजन, मुस्लिम और आदिवासियों को ऊपर लाने के लिए संघर्ष करें, भले ही उनकी योग्यता आवश्यक रूप से कम हो। वे मानते थे कि सदियों पुराने इतिहास में जो कुछ हुआ, उसे अब खत्म किया जाना चाहिए।
समाजवादियों से लोहिया की अपेक्षा थी कि वे अंतरजातीय, खासतौर से अलग-अलग वर्णों के बीच होने वाले विवाह को बढ़ावा दें। वे लिखते हैं, “अगर जाति के बंधन को तोड़ दिया जाए या उसमें थोड़ी ढील दी जाए तो उच्च जाति के बहुत से युवा पिछड़ी जातियों की महिलाओं की ओर आकर्षित होंगे और अपने साथ-साथ देश के लिए खुशियां लाएंगे। ठीक इसी तरह पिछड़ी जातियों के लड़के उच्च जातियों की महिलाओं की जिंदगी में प्रवेश कर सकेंगे।”
1960 में लोहिया ने जाति के अध्ययन और पिछड़ेपन को समझने के लिए संघ के गठन की बात कही थी। उन्होंने इस संघ के आठ मुख्य उद्देश्य बताए, जिनमें से दो के बारे में बताता हूं। पहला यह कि धर्म के साथ-साथ उसकी प्रथाओं को भी जाति दोष से मुक्त किया जाए, इस विश्वास के साथ कि अंतरजातीय विवाह करने से जातियां खत्म हो सकती हैं। दूसरा यह कि सरकारी पदों, राजनीतिक दलों, व्यापार और सशस्त्र सेवा में कानून या परंपरा के तौर पर 60 प्रतिशत पदों को पिछड़ी जाति, महिलाओं, हरिजन और आदिवासियों के लिए सुरक्षित करने की मांग की जाए।
पुस्तक के एक दिलचस्प हिस्से में 1955-56 में एक तरफ डॉ. लोहिया और उनके सहयोगियों तथा दूसरी तरफ डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच आदान-प्रदान किए गए पत्रों की एक शृंखला को पुन: प्रस्तुत किया गया है। यहां इन दोनों नेताओं और उनके अनुयायियों को एक-दूसरे के करीब लाने का प्रयास किया गया था, शायद इस उद्देश्य से कि उनकी दोनों पार्टियां 1957 के आम चुनावों में एक साझा मंच पर लड़ें। लोहिया और आंबेडकर के बीच जब पत्र-व्यवहार की शुरुआत हुई थी, लोहिया ने आंबेडकर से कहा था, “मैं चाहता हूं कि सहानुभूति के साथ गुस्सा भी जुड़ जाए और आप न सिर्फ पिछड़ी जातियों के, बल्कि भारतीय लोगों के भी नेता बनें।” आंबेडकर ने लोहिया के पत्र का जवाब देते हुए लिखा, “आप मुझसे 2 अक्तूबर को दिल्ली में आकर मिलें।” यह गांधी का जन्मदिन था और शायद यह महज एक संयोग था। दुर्भाग्य से लोहिया के घुमक्कड़ जीवन और आंबेडकर के खराब स्वास्थ्य के कारण दोनों क्रांतिकारी सुधारक व्यक्तिगत रूप से मिलकर संभावित सहयोग पर चर्चा नहीं कर पाए।
6 दिसंबर, 1956 को आंबेडकर का निधन हो गया। लोहिया ने अपने साथी समाजवादी मधु लिमये को लिखा, “आंबेडकर भारतीय राजनीति के महान व्यक्ति थे। गांधी के साथ-साथ वे भी सबसे बड़े हिंदू थे। इस तथ्य ने मुझे हमेशा से एक संबल और विश्वास दिया है कि हिंदू धर्म से जाति व्यवस्था एक दिन खत्म हो सकती है।” उन्होंने आगे लिखा, “डॉ. आंबेडकर विद्वान, ईमानदार, साहसी और स्वतंत्र व्यक्ति थे। उन्हें बाहरी दुनिया में ईमानदार भारत के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता था। लेकिन वे थोड़े सख्त थे। उन्होंने गैर-हरिजन का नेता बनने से मना कर दिया।”
लोहिया ने सोचा कि आंबेडकर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उन्हें डॉ. आंबेडकर ही बना रहने दिया जाए। जातिगत भेदभाव के प्रति लोहिया की गहरी जागरूकता उन्हें अपने समय के अन्य समाजवादियों से अलग करती है और यही बात उनके ‘नारीवाद’ पर भी लागू होती है। वे लिखते हैं, “अगर भारतीय लोग पृथ्वी पर सबसे दुखी हैं, तो जातिगत भेदभाव और महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण इस पतन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।” लोहिया ने लिखा है, “एक पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा होता है कि महिला का स्थान रसोई में है। ऐसे में समाजवादियों को इस बात का विरोध करते हुए कहना चाहिए कि ऐसे में तो पुरुषों की जगह नर्सरी में होनी चाहिए। साठ सालों से यह तर्क दिया जा रहा है कि बच्चों के पालन-पोषण में पति और पिता को बराबरी के साथ हिस्सा लेना चाहिए। यह एक आदर्श स्थिति हो सकती है, लेकिन व्यवहार में ऐसा कहीं दिखता नहीं।”
इस कॉलम में उद्धृत लेख, पत्र और भाषण 1953 और 1961 के बीच लिखे गए थे। ऐसा हो सकता है कि अभी ब्राह्मणवाद राजनीति और प्रशासन पर उतना हावी न हो, जितना 1950 के दशक में था। फिर भी संस्कृति और आर्थिक जीवन में वे आबादी में अपने हिस्से के अनुपात से कहीं ज्यादा प्रभाव डालते हैं। इसलिए कई मामलों में जाति पर लोहिया के विचार और शब्द एक अद्भुत समकालीनता रखते हैं।