टेस्ट इतिहास में सबसे सफल कप्तान ज्यादातर बल्लेबाज ही थे, जिनमें डॉन ब्रैडमैन, क्लाइव लॉयड, लेन हटन, फ्रैंक वॉरेल और एलन बॉर्डर प्रमुख थे। यह उस समय की बात है, जब स्टीव वॉ की कप्तानी की सफलता का दौर शुरू नहीं हुआ था। इसके बाद भी मैंने तर्क दिया था कि कुछ गेंदबाज भी बेहतरीन कप्तान साबित हुए हैं, जैसे रिची बेनॉ (ऑस्ट्रेलिया) और रे इलिंगवर्थ (इंग्लैंड)। दोनों स्पिन गेंदबाज थे, पर उन्होंने अपने-अपने देश के लिए बेहतर कप्तानी की थी। उस समय भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन अपने कॅरिअर के आखिरी दौर में थे। मैंने कहा था कि जब अजहरुद्दीन रिटायर होंगे तो अनिल कुंबले एक योग्य उत्तराधिकारी बनेंगे। उन्होंने अपनी घरेलू टीम कर्नाटक को रणजी ट्रॉफी में जीत भी दिलाई है। जिस तरह रिची बेनॉ और रे इलिंगवर्थ के पास क्रमश: एलन डेविडसन, जॉन शॉ और डेरेक अंडरवुड जैसे प्रमुख गेंदबाज थे, जो उनके साथ विकेट भी लेते थे, उसी तरह कुंबले भी जवागल श्रीनाथ पर भरोसा कर सकते थे।
अगर गेंदबाज-कप्तान की बात की जाए तो वे कपिल देव थे, जो खेल के दौरान अधिकांश समय तक टीम के एकमात्र प्रमुख गेंदबाज थे। इसके विपरीत इस बात की आशंका बहुत कम है कि कुंबले को यह पता न हो कि उन्हें खुद मैदान पर कब उतारना है। कपिल देव ने इस कमी के बाद भी एक कप्तान के रूप में खासकर 1983 और 1986 में इंग्लैंड में कुछ उल्लेखनीय सफलताएं हासिल कीं। सालों पहले प्रकाशित उस कॉलम में मैंने लिखा था कि क्रिकेट में गेंदबाज-कप्तान के प्रति भेदभाव होना एक आम बात है। क्रिकेट में बल्लेबाज खेल के ग्लैमर बॉय होते हैं। इतिहास से हमें इस बात का पता चलता है कि गेंदबाज भी अच्छे कप्तान हो सकते हैं, अगर उनसे इस बात की उम्मीद न की जाए कि अकेले ही मैच जिता देंगे। जब तक श्रीनाथ अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं, तब तक हमें अकेले कुंबले द्वारा ही दूसरे पक्ष को धराशायी करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
शायद मैं अंधेरे में तीर चला रहा था। एक साल से भी कम समय में अजहर को कप्तानी से हटाकर सचिन तेंदुलकर के पहले और ऊपरी क्रम में खराब प्रदर्शन के बावजूद कप्तान बना दिया गया था। 8 टेस्ट मैचों के बाद तेंदुलकर की जगह गांगुली को कप्तान बनाया गया, जिन्होंने घरेलू मैचों में अच्छा प्रदर्शन किया था। जब उनके खराब फॉर्म की वजह से उन्हें टीम से बाहर किया गया तो राहुल द्रविड़ को कमान सौंप दी गई। अजहरुद्दीन के सभी उत्तराधिकारी तेंदुलकर, गांगुली और द्रविड़ भी बल्लेबाज ही थे। ये सभी टीम के लिए विकेट लेने और मैच जिताने के लिए अनिल कुंबले पर निर्भर थे। यहां तक कि 2006 में श्रीलंका के खिलाफ हुए एक टेस्ट मैच में जब द्रविड़ उपलब्ध नहीं थे, तब भी अनिल कुंबले के टीम में रहते कम अनुभव वाले वीरेंद्र सहवाग को कप्तान बनाया गया।
अजहर के रिटायरमेंट के बाद भी अनिल कुंबले को 83 टेस्ट मैच खेलने के बाद 2007 में पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय टीम का नेतृत्व करने का मौका मिला। क्या हो जाता, अगर कुंबले को पहले कप्तान बना दिया गया होता? कुंबले को भी तेंदुलकर जितना ही सम्मान प्राप्त था, मैदान पर वे गांगुली जितने ही आक्रामक थे और द्रविड़ जितने चतुर भी। अगर कुंबले को 1999 में कप्तान बनाया गया होता तो उन्हें एक दशक तक टीम की सेवा करने का अवसर मिलता। पहले श्रीनाथ के साथ और बाद में हरभजन सिंह तथा जहीर खान के साथ 20 विकेट लेने और टेस्ट मैच जीतने का आनंद मिलता। वास्तव में, कुंबले की कप्तानी का कार्यकाल बहुत छोटा था। इसका मुख्य आकर्षण 2008 का पर्थ टेस्ट था, जिसमें 2024 के पर्थ टेस्ट की तरह भारत मैच में पराजित और निराश दिख रहा था। सिडनी में खेला गया पिछला टेस्ट मैच भारत गलत निर्णयों के कारण हार चुका था। इसके बाद भी कुंबले ने पर्थ में शानदार जीत के लिए निराश खिलाड़ियों को प्रभावी ढंग से एकजुट किया और शानदार जीत दिलाई थी।
इस बार न्यूजीलैंड के खिलाफ घर में 3-0 से हार के बाद विशेषज्ञों ने ऑस्ट्रेलिया में भारत की हार के अनुमान लगाए थे। कप्तान रोहित शर्मा और प्रमुख बल्लेबाज शुभमन गिल, दोनों ही पहले टेस्ट में नहीं खेल रहे थे। भारत ने पहले बल्लेबाजी की और पूरी टीम 150 रन पर आउट हो गई, तो क्रिकेट पंडितों का 4-0 से हारने का अनुमान सही साबित होने लगा था। तभी पहले दिन के आखिरी सत्र के खेल में जबरदस्त बदलाव आया और भारत के कप्तान, जो टीम के सबसे अच्छे गेंदबाज भी थे, ने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी क्रम को पूरी तरह तोड़कर रख दिया। अगले दो दिनों में भारतीय बल्लेबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए एक मजबूत स्थिति बनाई और भारत ने जीत हासिल की।
पर्थ में जसप्रीत बुमराह ने जिस विश्वास के साथ टीम का नेतृत्व किया, उसकी व्यापक रूप से सराहना की गई। मैच की समाप्ति पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी बुमराह ने क्रिकेट और जिंदगी के बारे में असाधारण बुद्धिमानी और परिपक्वता दिखाई। रोहित शर्मा की बढ़ती उम्र को देखते हुए कुछ विशेषज्ञों ने यह सुझाव दिया था कि शुभमन गिल को भविष्य में कप्तान बनाया जाए। इसके अलावा ऋषभ पंत के विकल्प की भी चर्चा थी। ये सभी विचार केवल गेंदबाजों के कप्तान बनने के खिलाफ के पूर्वाग्रह पर आधारित थे। अब बुमराह के पर्थ में शानदार नेतृत्व के बाद उन्हें शर्मा का उत्तराधिकारी बनना चाहिए।
जनवरी 2008 के पर्थ टेस्ट की जीत के समय भारत के कप्तान अनिल कुंबले की उम्र 37 साल थी। उनका कॅरिअर ज्यादा लंबा नहीं था। 2024 के पर्थ टेस्ट की जीत के समय भारत के कप्तान जसप्रीत बुमराह की उम्र 31 साल से भी कम थी। रोहित शर्मा जल्द ही क्रिकेट को अलविदा कह सकते हैं, लेकिन बुमराह के पास टेस्ट क्रिकेट के अगले चार या पांच साल और हो सकते हैं। कुंबले की तरह बुमराह ने भी विकेट लेने वाले अपने साथियों पर भरोसा जताया है। टीम में अश्विन, जडेजा और शमी ही बुमराह से उम्र में बड़े हैं और सभी के पास शायद एक या दो साल से ज्यादा का समय नहीं बचा है। हालांकि सिराज और कुलदीप, दोनों ही बुमराह से छोटे हैं, जबकि पर्थ में हर्षित राणा की तरह और भी युवा भारतीय गेंदबाज हैं, जो टेस्ट क्रिकेट में अपनी छाप छोड़ सकते हैं। ये सब जसप्रीत बुमराह के लिए भारत का अब तक का सबसे बेहतरीन गेंदबाज-कप्तान बनने के लिए अच्छे संकेत हैं।