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जानना जरूरी है: गंगा ने क्यों मारे अपने सात पुत्र? शाप से मुक्त करने की प्रतिज्ञा बना कारण

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 01 Dec 2024 05:17 AM IST

सार

गंगा ने शांतनु से कहा, वशिष्ठ के शाप से अष्ट वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा और मैंने इन्हें शाप से मुक्त करने की प्रतिज्ञा की थी, इसलिए जन्म लेते ही मारकर मुक्त कर दिया।
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जानना जरूरी है, संस्कृति के पन्नों से - फोटो : अमर उजाला


ब्रह्मा के शाप के फलस्वरूप महाभिष ने राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लिया। प्रतीप की मृत्यु के उपरांत शांतनु राजा बन गए। एक बार शांतनु ने गंगा-तट पर एक सुंदर स्त्री को देखा, जिसे देखते ही उन्हें उससे प्रेम हो गया। वह स्त्री कोई और नहीं, अपितु देवी गंगा थीं। शांतनु ने गंगा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, तो गंगा बोलीं, ‘मुझे स्वीकार है। परंतु आपको वचन देना होगा कि मैं अच्छा-बुरा जो कुछ करूं, आप मुझे रोकेंगे नहीं और न ही मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे। जिस दिन आपने यह वचन तोड़ा, उसी दिन मैं आपको छोड़कर चली जाऊंगी।’


शांतनु ने गंगा की शर्त मान ली। उन्होंने गंगा से विवाह कर लिया और दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया। शांतनु बहुत प्रसन्न थे, किंतु तभी उन्होंने देखा कि गंगा ने अपने नवजात पुत्र को नदी में बहा दिया। शांतनु को बहुत क्रोध आया, लेकिन वह गंगा की शर्त से बंधे थे, इसलिए उन्होंने गंगा से कोई प्रश्न नहीं किया। फिर कुछ समय बाद गंगा ने अपने दूसरे पुत्र को भी नदी में बहा दिया। इस तरह एक-एक करके गंगा ने शांतनु की आंखों के सामने अपने सात पुत्रों को नदी में डुबाकर मार डाला।


फिर जब आठवां पुत्र उत्पन्न हुआ, तो गंगा उसे भी नदी की ओर ले जाने लगीं। इस बार शांतनु से सहन नहीं हुआ। उन्होंने गंगा से नवजात शिशुओं की हत्या करने का कारण पूछा और अपने आठवें पुत्र को छोड़ देने का आग्रह भी किया।


तब गंगा ने उत्तर दिया, ‘महाराज, मैं आपके आठवें पुत्र को नहीं मारूंगी। परंतु शर्त के अनुसार मैं अब यहां नहीं रह सकती। ये आठों पुत्र दरअसल, अष्ट वसु हैं। वशिष्ठ के शाप से इन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा और मैंने इन्हें शाप से मुक्त करने की प्रतिज्ञा की थी, इसलिए मैंने इन्हें जन्म लेते ही मारकर मुक्त कर दिया। मैं आपके इस आठवें पुत्र को शस्त्र और शास्त्र में पारंगत करके उचित समय पर आपको लौटा दूंगी।’


शांतनु ने पूछा, ‘महर्षि वशिष्ठ ने वसुओं को शाप क्यों दिया था?’ देवी गंगा ने वसुओं की कथा सुनाई : महर्षि वशिष्ठ मेरु पर्वत के निकट रहते थे। कामधेनु की पुत्री नंदिनी भी उनके साथ रहती थी। एक बार पृथु आदि अष्ट वसु, अपनी पत्नियों के साथ वहां पहुंचे। उस समय वशिष्ठ आश्रम से बाहर गए हुए थे। उन आठ में से द्यौ नामक एक वसु की पत्नी की दृष्टि नंदिनी पर पड़ गई। उसने द्यौ से कहा कि वह उसके लिए नंदिनी का हरण कर ले आए। द्यौ ने अपने भाइयों के साथ मिलकर वशिष्ठ की नंदिनी गाय को चुरा लिया। वशिष्ठ जब आश्रम लौटे, तो उन्हें नंदिनी नहीं मिली। उन्हें दिव्य दृष्टि से पता लग गया कि वसुओं ने उनकी गाय चुराई है। तब वशिष्ठ ने वसुओं को शाप दिया, ‘वसुओं ने मेरी गाय का हरण किया है, इसलिए उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना होगा।’ वसुओं ने वशिष्ठ से क्षमा मांगी और उन्हें उनकी नंदिनी लौटा दी। तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा, ‘तुम में से सात वसु तो एक-एक वर्ष में ही मनुष्य योनि से मुक्त हो जाएंगे, किंतु नंदिनी को चुराने वाले इस द्यौ वसु को बहुत लंबे समय तक मर्त्यलोक में रहना पड़ेगा।’


यह कथा सुनाकर गंगा ने शांतनु से कहा, ‘आपके पहले सात पुत्र थे, वही सातों वसु, जिन्हें मैंने नदी में बहाकर मनुष्य योनि से मुक्त कर दिया। परंतु यह अंतिम बालक द्यौ नामक वसु, वशिष्ठ के शाप के कारण चिरकाल तक मनुष्य लोक में रहेगा।’ यह कहकर गंगा, अपने आठवें पुत्र को साथ लेकर अंतर्धान हो गईं। बाद में वही आठवां वसु, गंगा पुत्र भीष्म के नाम से विख्यात हुआ।

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