एक नकली अंधा, जब गंगा को बेच देता है, तो गंगा का संवाद है-‘अंधे बनकर ऐसा काम करोगे, तो लोग अंधों की मदद नहीं करेंगे।’ इसी तरह कहावतों का प्रयोग दृश्यों और गीतों में करने की प्रेरणा उन्हें स्वर्गीय शैलेंद्र ने दी। राजकपूर दसवीं फेल थे, परंतु उनकी असली पाठशाला तो जिंदगी थी। उनकी सारी फिल्मों की प्रेरणा उन्हें जीवन के अपने अनुभवों से मिली। प्रथम प्रदर्शन में ‘जोकर’ के असफल होने का एक कारण यह भी था कि वह राजकपूर की आत्म-कथा न होकर, राजकपूर अभिनेता की ‘होबो’ छवि की कथा थी।
राजकपूर की फिल्मों के कथानक सामाजिक यथार्थ की भूमि में जन्म लेते थे, परंतु उनका ऊपरी स्वरूप फंतासी की तरह दिखता था। जीवन के दु:ख से भागकर आए हुए दर्शक फंतासी के नयनाभिराम स्वरूप में मनोरंजन पाते और प्रबुद्ध दर्शक सामाजिक संदर्भ और पात्रों की मानवीयता से अभिभूत हो जाते। राजकपूर की जिन फिल्मों में फंतासी और सामाजिकता का संतुलन बिगड़ा, उन्हें जनता ने अस्वीकृत कर दिया जैसे आह, जागते रहो और जोकर। फंतासी और पात्र के अंतर्द्वंद्व के सामंजस्य का श्रेष्ठ उदाहरण है आवारा का स्वप्न दृश्य। राजकपूर का फिल्म दर्शन ही नहीं, वरन पूरा जीवन है आधी हकीकत, आधा फसाना। राजकपूर पर अब्बास और अन्य कम्युनिस्ट लेखकों का प्रभाव रहा, तो उनकी मनपसंद किताब एन रेंड की फाउंटेन हेड भी रही है। उन्होंने जिस कुशलता के साथ बीवी की हकीकत के साथ प्रेयसी का फसाना मिलाया था- उसी निपुणता से अपनी फिल्मों में फंतासी और यथार्थ को भी मिलाया था। आज भी यकीन नहीं होता कि वह आदमी था या छलावा।
(नब्बे के दशक में श्रीराम तिवारी संपादित ‘पटकथा’ में प्रकाशित राजकपूर-प्रेमी फिल्म आलोचक स्व. जयप्रकाश चौकसे के आलेख के अंश)