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मौसम की मार: किसानों को कैसे मिले वाजिब मुआवजा, खामियों से भरी है फसल बीमा योजना

देविंदर शर्मा
Updated Wed, 05 Apr 2023 06:13 AM IST

सार

हाल के हफ्तों में मौसमी मार से फसलों को भारी नुकसान हुआ है, जिससे न केवल उत्पादन कम होगा, अनाज की गुणवत्ता प्रभावित होगी, बल्कि महंगाई भी बढ़ेगी। फसल बीमा योजना से किसानों को नुकसान की भरपाई की बात होती है, पर इसमें खामियों की वजह से किसानों को वाजिब मुआवजा नहीं मिल पाता।
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Rains hit wheat crop - फोटो : Agency


इस तरह की मौसमी आपदा जब आती है, तो अक्सर तर्क दिया जाता है कि फसल बीमा योजना से किसानों को हुए नुकसान की भरपाई हो जाएगी। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं है। पिछले छह साल से देश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना चल रही है और इन वर्षों में बीमा कंपनियों ने किसानों एवं सरकार से प्रीमियम के रूप में 17 लाख करोड़ रुपये से अधिक वसूले हैं। इस अवधि में इन कंपनियों ने करीब 13 लाख करोड़ रुपये किसानों को मुआवजे के रूप में दिया है। इसमें से 40,112 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों को मुनाफा हुआ है, जिनमें अधिकतर निजी कंपनियां हैं। लगता है कि इस योजना के जरिये सरकार ने बीमा कंपनियों का मुनाफा सुनिश्चित किया है, न कि किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई।


यदि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ठीक तरीके से तैयार की गई होती, तो किसानों को उनके नुकसान का वाजिब मुआवजा मिलता। किसानों की दस रुपये, पचास रुपये, पांच सौ रुपये, हजार रुपये आदि मुआवजे के रूप में मिलते हैं, जिनकी खबरें भी मीडिया में आती रहती हैं। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने यह नियम बना दिया है कि अगर किसानों को एक हजार रुपये से कम मुआवजा मिलता है, बाकी मुआवजे की भरपाई राज्य सरकार करेगी। आखिर ऐसी परिस्थिति क्यों पैदा हुई? इसका मतलब है कि इस व्यवस्था में गड़बड़ी है। यही वजह है कि फसल बीमा कराने वाले किसानों की संख्या में भी भारी गिरावट आई है। इस योजना के प्रति किसानों की उदासीनता को सरकार को दूर करना चाहिए।


अगर यह योजना प्रभावी होती, तो मौसमी आपदा से हुए नुकसान की भरपाई के लिए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं थी और स्वतः किसानों को वाजिब मुआवजा मिल जाता। अब सवाल उठता है कि इसे कैसे ठीक किया जा सकता है। पहली बात, आज सैटेलाइट से पेड़ों को गिना और ड्रोन से केवल कीटनाशक का छिड़काव ही नहीं किया जा सकता है, बल्कि खेतों में पराली जलाए जाने की भी जानकारी इकट्ठा की जाती है। तो फिर क्या कारण है कि किसानों को मुआवजा देने के लिए हर खेत का अलग-अलग आकलन करने के बजाय ग्रामीण स्तर पर सर्वेक्षण करके औसत निकाला जाता है? मान लीजिए, मेरी 80 फीसदी फसल का नुकसान हो गया, लेकिन ग्रामीण स्तर पर सर्वेक्षण करके जो औसत निकाला जाता है, उसमें नुकसान 30 फीसदी बताया गया, तो मुझे बाकी 50 फीसदी नुकसान का मुआवजा नहीं मिलेगा।


दूसरी बात यह है कि जब कंपनियों को बीमा का ठेका मिलता है, तो ये कंपनियां बोली लगाती हैं कि अमुक क्षेत्र में इस सीमा से ज्यादा के नुकसान की हम भरपाई नहीं करेंगे। यह बिल्कुल गलत है। किसान हमेशा औसत से ज्यादा का उत्पादन करते हैं और नुकसान होने पर उन्हें उसका मुआवजा नहीं मिलता। जैसे मान लीजिए कि बीमा कंपनियों ने बोली लगाकर यह तय कर दिया कि इस इलाके में प्रति हेक्टेयर 40 क्विंटल से कम का उत्पादन होगा, तभी हम मुआवजे का भुगतान करेंगे और किसान ने मौसमी मार के बावजूद प्रति हेक्टेयर 60 क्विंटल का उत्पादन किया, तो उसे तो मुआवजा मिलेगा ही नहीं। उसका तो नुकसान हो ही गया। दुनिया में कहीं भी इस तरह सीमा निर्धारित नहीं की जाती है, तो फिर हमारे देश में इन कंपनियों को सीमा निर्धारित करने की इजाजत क्यों दी गई? कहने का तात्पर्य कि फसल नुकसान होने पर हर खेत का अलग-अलग आकलन होना चाहिए और नुकसान की भरपाई के लिए सीमा निर्धारित नहीं की जाए, तभी किसानों के साथ न्याय हो सकेगा।


नुकसान का आकलन करने के लिए प्रौद्योगिकी (सैटेलाइट) होना चाहिए और सरकार को यदि उसकी जांच करवानी हो, तो पटवारी से भी खेत का सर्वेक्षण करवा लिया जाए। जब सैटेलाइट यह बता सकता है कि पराली जलाने से पर्यावरण को इतना नुकसान हुआ, तो वह यह क्यों नहीं बता सकता कि मौसम की मार से फसलों को कितना नुकसान हुआ। असल में कंपनियों की मदद करने के लिए ऐसा नहीं किया जाता है।


एक और बात है, कि इन बीमा कंपनियों ने कहीं कोई निवेश नहीं किया है। ये राज्य सरकार के आंकड़ों पर निर्भर रहती हैं। राज्य सरकार नुकसान होने पर पटवारी से सर्वेक्षण करवाती है। इसमें राज्य सरकार की मशीनरी तो लगी रहती है, लेकिन बीमा कंपनियों का कोई व्यक्ति इन सबमें शामिल नहीं रहता है। अगर ये कंपनियां इन कामों में अपने कर्मचारी को लगाए, तो बहुत से रोजगार का सृजन हो सकेगा। सरकार इन कंपनियों पर निवेश करने के लिए दबाव क्यों नहीं बनाती?
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उत्पादन का नुकसान होने के अलावा, मौसम की इस मार का असर अनाजों की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा, जिसमें किसानों की कोई गलती नहीं है। ऐसे में राज्य सरकारों को कमतर गुणवत्ता वाली फसलों की खरीद के लिए भी पहल करनी चाहिए। कुछ राज्यों ने किसानों की खराब गुणवत्ता वाले अनाजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का वादा किया है, जो स्वागत योग्य है। इसके अलावा, हमें अपने आपदा राहत तंत्र को भी सुदृढ़ करना होगा। उसके तहत भी इस नुकसान की भरपाई की जा सकती है। जैसे, पंजाब में फसल बीमा योजना नहीं है, लेकिन वहां आपदा राहत तंत्र के तहत नुकसान की भरपाई की जाएगी। लेकिन किसान को नुकसान की भरपाई तत्काल होनी चाहिए। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन का संकट बढ़ रहा है, हमें हमेशा अपने देश में कम से कम दो साल के लिए खद्यान का भंडार सुरक्षित रखना चाहिए।

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