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सवाल: यह कैसा बांग्लादेश है, क्या फिर लौट रहा है काला दौर?

तस्लीमा नसरीन
Updated Thu, 24 Oct 2024 07:11 AM IST

सार

कट्टरवादी जो नया बांग्लादेश बना रहे हैं, उसे मैं जिहादिस्तान कहना ज्यादा पसंद करूंगी। उसी देश में मैं पैदा हुई थी, उसी देश में पली-बढ़ी। आज मुझे विश्वास ही नहीं होता। मेरा देश आज उग्र, असभ्य, कट्टर, हिंसक और बदला लेने पर उतारू देश बन गया है।
 
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बांग्लादेश में बंगभवन का घेराव करने पहुंचे प्रदर्शनकारियों को सेना ने रोका - फोटो : एएनआई


सात मार्च, 1971 को शेख मुजीबुर रहमान ने जो यादगार भाषण दिया था, उसे सुनने के बाद ही लोग मुक्तियुद्ध में भाग लेने के लिए कूद पड़े थे। इस दिन को राष्ट्रीय दिवस की मर्यादा न देने का अर्थ है बंगालियों के अस्तित्व को मर्यादा न देना। सात मार्च के भाषण, आजादी की घोषणा, मुक्तियुद्ध, विजय लाभ, पाकिस्तान के शोषण से मुक्ति, बांग्लादेश का जन्म-ये सब किन्हें सहन नहीं होता? जाहिर है, पाकिस्तान की सेना के विश्वस्त बंगाली रजाकारों को, उनके बच्चों और पोते-पोतियों को। इन लोगों का गुस्सा भारत पर भी है, क्योंकि बांग्लादेश को आजादी दिलाने में भारत ने मदद की थी। भारत के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने के बाद मूर्खों ने चुप्पी साध ली, क्योंकि उन्हें मालूम चल गया कि भारत को नाराज करने पर लाभ के बजाय उनका नुकसान ही होने वाला है। लेकिन वे मुक्तियुद्ध के समर्थकों को चिढ़ा रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि इसका उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। वे भूल गए कि सिर्फ अवामी लीग ही मुक्तियुद्ध की समर्थक नहीं है।


रजाकारों और उनके समूहों को छोड़कर बांग्लादेश के तमाम लोग मुक्तियुद्ध के समर्थक हैं। रजाकारों के बच्चे और उनके नाती-पोते यदि अब 21 फरवरी, 26 मार्च और 16 दिसंबर को रद्द घोषित करें, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। वे लोग अगर शहीद मीनार और स्मृतिसौध को ध्वस्त कर दें, तो हैरानी नहीं होगी। ये लोग अगर बांग्लादेश का नाम बदलकर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश या पूर्वी पाकिस्तान रख दें, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। अगर ये लोग 14 अगस्त को आजादी का दिवस मनाएं, तो हैरानी नहीं होगी। राष्ट्रपिता के रूप में ये लोग अगर जिन्ना की फोटो लगाएं, तो आश्चर्य नहीं होगा। ये लोग अगर बांग्लादेश में शरीयत कानून लागू करें, तो हैरानी नहीं होगी। अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस के सहयोगी और बांग्लादेश की कथित क्रांति के सूत्रधार महफूज आलम की पहली बार फेसबुक पोस्ट देखकर मैं डर गई। उनकी पोस्ट में लिखा है कि देश की एक इंच जमीन भी अवामी लीग या मुजीब समर्थकों के लिए नहीं है। वह कहना चाहते थे कि अवामी लीग नरसंहार की दोषी है, उसके लोगों ने आंदोलनकारी छात्रों की हत्या की है। इन सबका हिसाब होगा। हिसाब तो सबका ही होना चाहिए। जुलाई-अगस्त की कथित क्रांति से जो जिहादी जुड़े थे, उन्होंने तो पुलिस के लगभग तीन हजार जवानों का गला काटकर सड़कों पर उनकी लाशें उल्टी लटका दी थीं। इतनी बड़ी संख्या में पुलिस के जवानों की हत्या भी तो नरसंहार है, इन मामलों में भी न्याय क्यों नहीं होना चाहिए?


महफूज आलम छात्रों की हत्या को तो नरसंहार कह रहे हैं, पुलिस के जवानों की हत्या को नहीं। 15 जुलाई से आठ अगस्त तक जो खून-खराबा हुआ, उसकी जांच न होने से संबंधित जो कानून अंतरिम सरकार ने पारित किया है, मुजीब समर्थकों पर वह लागू नहीं होगा। सूत्रधार का कहना है कि बदला लेने की राजनीति वह करना नहीं चाहते, लेकिन विवश होकर करनी पड़ रही है। इसका मतलब वह मुजीब समर्थकों की हत्या करना चाहते हैं। उनका कहना है कि मुजीब समर्थकों के लिए एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ी जाएगी। यानी अवामी लीग से जुड़े लोगों को देश से निकाला जाएगा। लेकिन किसी को देश से भागने भी तो नहीं दिया जा रहा। यानी मुजीब समर्थकों को फांसी पर झुलाया जाएगा या उन्हें उम्रकैद की सजा मिलेगी। मुजीब के जिस समर्थक ने कभी खून नहीं किया, किसी हत्या का समर्थन नहीं किया, उसे भी सजा मिलेगी, क्योंकि उसने मुजीब के विचारों पर भरोसा किया।


इसका अर्थ क्या हुआ? यानी यह सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोगों की आजादी और विरोधी विचारधारा पर भरोसा नहीं करती। यानी यह सरकार लोकतंत्र, मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता पर भरोसा नहीं करती। ऐसी सरकार तो तानाशाही, हिंसक हसीना सरकार से भी सौ गुना हिंसक और तानाशाह है।


इस बीच बंगाल की अग्निकन्या मतिया चौधुरी का निधन हो गया। वहां की मिट्टी में उन्हें जगह नहीं मिली। वैसे में उन्हें उनके दिवंगत पति पत्रकार बजलुर रहमान की कब्र में दफन किया गया। 1960 के दशक में तानाशाह पाक सैन्य जनरल अयूब खान के विरोध में जो छात्र आंदोलन हुआ था, उसमें मतिया चौधुरी ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। उस दौर में उन्हें चार बार जेल में रहना पड़ा था। बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए बांग्ला अकादमी ने 2021 में उन्हें फेलोशिप दी थी। लेकिन इस वीर मुक्तियोद्धा को निधन के बाद राष्ट्र ने सम्मान नहीं दिया। 25 मार्च, 1971 को पाकिस्तानी सेना ने ढाका समेत दूसरे इलाकों में बंगाली बुद्धिजीवियों का सामूहिक संहार किया था। वही काला दौर अब लौट रहा है। कई प्रसिद्ध पत्रकारों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। लेखक-बुद्धिजीवी मोहम्मद जफर इकबाल के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ है। उन पर नरसंहार में लिप्त रहने का आरोप है। कुछ लोग समझ रहे हैं कि इसी रास्ते से बांग्लादेश नई शुरुआत की ओर बढ़ेगा।


यूनुस सरकार जफर इकबाल की विरोधी है, क्योंकि वह रजाकार विरोधी हैं। वह बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध के समर्थक हैं। इसी कारण उनके खिलाफ वारंट जारी हुआ है। कट्टरवादी जो नया बांग्लादेश बना रहे हैं, उसे मैं जिहादिस्तान कहना ज्यादा पसंद करूंगी। उसी देश में मैं पैदा हुई थी, उसी देश में पली-बढ़ी। आज मुझे विश्वास ही नहीं होता। मेरा देश आज उग्र, असभ्य, कट्टर, हिंसक और बदला लेने पर उतारू देश बन गया है। मुझे नहीं लगता कि लाल कालीन बिछा देने पर भी कभी मैं वहां लौटना चाहूंगी।    

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