भारत की बेहाल स्वास्थ्य सुविधाओं को मुद्दा तो माना जाता है, मगर सामान्य दिनों में इसे बेहद नीरसता के साथ लिया जाता है। ऐसा उपेक्षित मुद्दा सुर्खियों में तभी आता है, जब कोई बड़ा संकट आता है, जैसा कि फिलहाल स्वाइन फ्लू के मामले में देखा जा सकता है। इस बीमारी से अब तक देश भर में 700 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि पीड़ितों का आंकड़ा 11,000 के पार जाता दिख रहा है। हर गुजरते दिन के साथ ज्यादा मौतों और अब तक बीमारी से अप्रभावित क्षेत्रों में इसके फैलने की खबरें सुनने में आ रही हैं। इस मामले में राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की हालत सबसे खराब है। स्वास्थ्य की बेहतर बुनियादी व्यवस्था के बावजूद दिल्ली में स्वाइन फ्लू से होने वाली मौतें नहीं रुक पा रहीं। हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश में स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी हुई है, और यहां पहले ही इस बीमारी के चलते छह लोगों की मौत हो चुकी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने कहा है कि इस आपदा से निपटने में केंद्र, राज्य सरकारों की मदद करेगा। इस दिशा में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति भी सक्रिय हो चुकी है।
2009 में जब पहली बार स्वाइन फ्लू ने देश में दस्तक दी थी, तब स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह नया विषाणु पहेली बन गया था।तब 2010 के मध्य तक एक हजार से भी ज्यादा लोगों की इस बीमारी से मौत हुई थी। अफसोस की बात है कि पांच साल बीत जाने के बाद भी भारत इस विषाणु से लड़ने को तैयार नहीं दिख रहा। गौरतलब है कि आज की तरह उस वक्त भी इस आपदा ने लोगों का ध्यान स्वास्थ्य सुविधाओं के हमारे तंत्र की खामियों की ओर खींचा था, मसलन, प्रशिक्षित स्टाफ की कमी, हमारी प्रयोगशालाओं में क्षमता का और लोगों में जागरूकता का अभाव। आज की तरह उस वक्त भी ज्यादातर मौतें इलाज में विलंब के चलते हुई थीं। सवाल उठता है कि ऐसी आपदाओं के बार-बार लौटने की क्या वजह है।
दरअसल, हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य का जो संदेश है, वह ज्यादातर लोगों के पास पहुंच ही नहीं पाता। अब दिल्ली में रहने वाले एक बिहारी प्रवासी मुस्तफा का ही उदाहरण लीजिए। वह ज्यादा पढ़ या लिख नहीं पाता, और तकरीबन पौने दो करोड़ की जनसंख्या वाले शहर में ड्राइवर का काम करता है। स्वाइन फ्लू के बारे में उसने थोड़ा बहुत सुना है, मगर वह इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता। उसे यह भी नहीं पता कि यह बीमारी कैसे फैलती है और अगर ठीक ढंग से इसका इलाज न हो, तो यह जानलेवा भी साबित हो सकती है। मुस्तफा अखबार नहीं पढ़ता, उसके पास अपना टेलीविजन भी नहीं है, और वह रेडियो भी नहीं सुनता। देश भर में स्वाइन फ्लू को लेकर चर्चाएं चल रही हैं, मगर मुस्तफा इस बारे में अनजान है। वह सवाल उठाता है, 'मैं अलसुबह काम पर चला जाता हूं और शाम को थका-हारा वापस आता हूं। मेरे पास ऐसी खबरें जानने की फुर्सत ही कहां है?' दिल्ली के एक कोने में बसे अयानगर में वह रहता है, जहां हाल के समय में कोई स्वास्थ्यकर्मी नहीं पहुंचा है। स्वच्छता रखने व साबुन से हाथ धोने का महत्व या बीमारी के लक्षण दिखने पर जांच कराने की जरूरत के बारे में किसी ने उसे नहीं बताया। अखबार पढ़ने वाले मध्यवर्ग के पाठक को मुस्तफा की कहानी थोड़ी अजीब लग सकती है। मगर, देश के शहरों और गांवों में मुस्तफा जैसे तमाम लोग हैं।
स्वाइन फ्लू के ज्यादा गंभीर मामले में पीड़ित को सघन इलाज की जरूरत होती है। वहीं, कम गंभीर मामले में टैमी फ्लू जैसी विषाणु रोधी दवाओं से काम चल जाता है। मगर सबसे ज्यादा जरूरी यह जानकारी है कि इस बीमारी को फैलने से रोकने के उपाय क्या हैं, मसलन, ज्यादा जोखिम वाली जगहों पर मास्क पहनना, हाथ धोना इत्यादि। बीमारी को रोकने के इन संदेशों का कितना प्रचार किया गया है? क्या केंद्र व राज्य सरकारों ने बीमारी की पूर्व चेतावनी के लिए ऐसा कोई अलर्ट जारी किया है, जो दूरवर्ती सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच सके? ऐसा नहीं है कि केवल अशिक्षित और पिछड़े तबके को ही स्वाइन फ्लू के फैलने की वजहों के बारे में जानकारी न हो। हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पत्रकारों को बताया कि यह बीमारी मच्छर के काटने से फैलती है। मुंबई की मेयर स्नेहल आंबेकर स्वाइन फ्लू को दिल की बीमारी मानती हैं, और म्यूनिसिपल अधिकारियों को बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए ज्यादा पेड़ लगाने की सलाह देती हैं। साफ है कि इनमें से किसी को यह नहीं पता कि स्वाइन फ्लू की वजह हवा से फैलने वाला एक विषाणु है।
स्वास्थ्य कार्यकर्ता डॉ नरेंद्र गुप्ता के मुताबिक राजस्थान में स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों की प्रमुख वजह यह है कि राज्य सरकार देर से सचेत हुई। वह बताते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की देखरेख से जुड़े त्वरित उपायों के साथ-साथ व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत थी, मगर सरकार की तरफ से इस काम में लगातार विलंब हुआ। इसके अलावा खासकर ग्रामीण स्तर के उपकेंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बीमारी से निपटने के लिए जरूरी सुविधाओं का बिल्कुल अभाव होने की वजह से हालात और गंभीर हो गए। जन स्वास्थ्य से जुड़े एनजीओ जन स्वास्थ्य अभियान की एक स्थानीय इकाई के अनुसार नीचे के स्तरों पर पीड़ितों की पहचान करने और उन्हें जरूरी इलाज मुहैया कराने में देरी बरती गई। यही हाल देश के दूसरे भागों का भी है।यही वजह है कि जैसे-जैसे बजट का दिन नजदीक आ रहा है, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकार के ध्यान देने की उम्मीद बढ़ती जा रही है। हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च न सिर्फ बढ़ाने की जरूरत है, बल्कि यह ध्यान देने की भी आवश्यकता है कि यह धन सही ढंग से खर्च हो। मगर इसकी शुरुआत सार्वजनिक तौर पर जागरूकता बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिए जाने से होनी चाहिए।