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मनोविज्ञान: जिसे अवसाद समझ रहे हैं वह बर्न आउट तो नहीं, लेकिन दोनों में है बड़ा फर्क

डैनी ब्लम Published by: यशोधन शर्मा Updated Sun, 28 Jan 2024 07:06 AM IST

सार

अमूमन बर्न-आउट को काम की अधिकता से जोड़ा जाता है, लेकिन हर मामले में ऐसा नहीं है।
 
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अवसाद (सांकेतिक) - फोटो : istock


आप इतना थका हुआ महसूस कर रहे हैं कि फोन पर किसी से बात करना तो दूर फोन की घंटी बजते ही उसे उठाकर दीवार पर फेंकने को आतुर हैं। आपको न तो अपना घर पसंद आ रहा है और न ही साथ रहने वाले लोग। आपको नहीं पता कि थकान की यह लहर बर्न-आउट है या फिर किसी तरह का अवसाद। आप सही शब्द ढूंढने में नाकाम होकर अपने दोस्तों को बस यही कहते हैं कि मैं थक गया हूं।


इंग्लैंड की केंट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर और लेखिका एंजेला नील-बार्नेट कहती हैं, ‘अमूमन बर्न-आउट को काम की अधिकता से जोड़ा जाता है, लेकिन हर मामले में ऐसा नहीं है।’ वह कहती हैं, ‘जब लोगों को ऐसा महसूस होता है कि दैनिक जीवन पर उनका नियंत्रण नहीं है, तो वे अपने कार्यों की छोटी-छोटी बातों में उलझ कर परेशान हो सकते हैं। ऐसे लोग अपनी नौकरी के प्रति भी अनमने दिखते हैं। जब लोगों को लगता है कि वे कुछ नहीं कर सकते, वे सहानुभूति खोजने लगते हैं और वह न्यूनतम काम करने लगते हैं, जो उन्हें नौकरी पर बनाए रखने के लिए जरूरी हो।’


परिस्थितियां बदलने से अवसाद

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बर्न-आउट को रोग न मानकर, काम से जुड़ी एक सामान्य घटना मानता है। लेकिन वह अवसाद को रोग मानता है, जिसमें लोग उन गतिविधियों का आनंद उठाने में असमर्थ हो जाते हैं, जिन्हें कभी वे काफी महत्व देते थे। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेसी गोल्ड के अनुसार बर्न-आउट और अवसाद दोनों में आप कम या ज्यादा सो सकते हैं, लेकिन अवसाद की अंतिम परिणति इस विचार के साथ हो सकती है कि जीवन जीने लायक नहीं है, जबकि बर्न-आउट में ऐसा नहीं होता। अमेरिकी साइकिएट्रिक ऐसोसिएशन की डॉ रेबेका ब्रेंडल कहती हैं कि दोनों में मुख्य फर्क यह होता है कि जब आप काम से दूर होते हैं, तब बर्न-आउट खत्म होने लगता है, जबकि परिस्थितियां बदलने से अवसाद में कमी नहीं आती।


ऐसे मिल सकते हैं जादुई नतीजे

अवसाद की वजहें आनुवंशिक हो सकती हैं या जीवन में किसी दर्दनाक घटना को सहने या फिर बड़े बदलाव से गुजरने वालों में अवसाद की समस्या हो सकती है। बर्न-आउट खुद भी अवसाद के लिए जमीन तैयार कर सकता है। डॉ गोल्ड के अनुसार, ‘अवसाद हो या बर्न-आउट दोनों में फर्क जरूर है लेकिन किसी तरह का मूवमेंट दोनों स्थितियों में कारगर साबित हो सकता है। प्रकृति को निहारते हुए दस मिनट की वॉक (व्यायाम की तरह नहीं) से काफी फायदा मिल सकता है। कुछ समय के लिए खुद को मोबाइल स्क्रीन से दूर रखने के भी जादुई नतीजे होते हैं।’

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