इस समय फेंकू जी चुनाव अभियान और चुनाव मैदान, दोनों जगह हैं। भाषण से हालांकि वोटर का पेट नहीं भरता, पर उनके भाषण लाजवाब हैं। फूलमालाओं से लदे वह बार-बार अपने चेहरे की घनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हैं तथा देश में रामराज लाने के पक्ष में दलील देते हैं।
इस समय फेंकू जी आश्वासनों के स्वादिष्ट फल बांट रहे हैं। अपने अद्भुत कला कौशल से उन्होंने अपने वरिष्ठों को दरकिनार कर दिया है। वह इतना फेंकते हैं कि सभासदों का समेटना मुश्किल हो जाता है और वे कुढ़ते हुए उनके व्याख्यान पर ताली बजाने को विवश होते हैं।
जनता के बीच बैठे उनके चमचे ताली बजाते हैं, तो जनता भी हक्की-बक्की ताली पीटने लगती है। फेंकू जी को इससे बड़ी शांति मिलती है।
वह देश की समस्याओं के समाधान पलक झपकते ही अपने भाषणों में दे जाते हैं। सरकार की तो वह ऐसी खबर लेते हैं कि वह कुछ सीखने के बजाय हंसने लगती है। सरकार की तमाम योजनाओं की वह खिल्ली उड़ाते हैं, पर खुद सत्तारूढ़ हुए, तो क्या करेंगे, यह नहीं बताते। वह अपने भाषणों के लिए कभी लाल किले की मांग करते हैं, तो कभी संसद भवन की।
कभी-कभी तो वह अंतरराष्ट्रीय मामलों पर भी अपनी राय प्रकट करते हैं, ताकि देश को बता सकें कि इस मामले में वह भोंदू नहीं हैं। हालांकि देशवासी विदेशी मामलों में उनसे क्या सीखते-समझते हैं, यह तो वे ही जानें।
फेंकू जी देशवासियों से अनुरोध या विनय नहीं करते, वह उनसे आह्वान व अपील करते हैं कि उन्हें उनके बताए गए मार्ग पर ही चलना है। जैसे उन्होंने मान लिया है कि वह प्रधानमंत्री बन चुके हैं, बस लाल किले पर झंडा फहराना बाकी है।
चुनाव में प्रत्याशियों को टिकट भी उनकी पसंद से, उनके ही लोगों को दिए गए, ताकि उनके राज्याभिषेक के समय किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो। सपने देखने का हक ईश्वर ने सबको दिया है, इस हक को वह अपने पक्ष में सदैव आंखों में डाले घूमते रहते हैं।
फेंकू जी का क्या होगा, कोई नहीं जानता, क्योंकि मतदाता को ‘राइट टू रिजेक्ट’ भी मिल गया है। वह कभी मिलें, तो मैं उनसे हाथ मिलाकर गदगद होना चाहूंगा, क्योंकि कई राजनीतिक दल पहले ही उनसे हाथ मिलाकर गदगद हो चुके हैं।