उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जहां हर तरह की गड़बड़ियां होती हैं। बलात्कार, फांसी, हत्या, बिजली की आंखमिचौली, सत्ता का रौब, कानून-व्यवस्था का अभाव, भय का माहौल और दुराचार का घिनौना रूप-इन सबको उन लोगों की धृष्टता और बयानबाजी से बढ़ावा मिलता है, जिन पर जिम्मेदारी होने के बावजूद जो अपने काम के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश के मामले में नियति की भी सीमाएं हैं; इस राज्य में वह कर्म के उस सिद्धांत का भी पालन नहीं करती, जिसके तहत अच्छी और बुरी खबरों का वैकल्पिक चक्र चलता है। यहां तो सिर्फ बुरी खबरें ही हैं। अंधेरे में डूबते इस राज्य को देखकर लगता है कि नियति के आदेश का किसी ने अपहरण कर लिया हो।
यहां राजनीतिक अयोग्यता और नौकरशाही की अक्षमता का स्तर देखने लायक है। पर एक और बुनियादी मुद्दे पर सोचने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश से बुरी खबरें आने की मुख्य वजह यह है कि यह राज्य अपने बड़े आकार-प्रकार से अभिशप्त है। जनता से किए गए वायदे और उसके प्रदर्शन के बीच की बढ़ती खाई के मूल में शासन का ढांचा, राज्य का आकार और उसकी जटिलताएं हैं।
अब जरा इन जटिलताओं के स्तर और चुनौतियों पर विचार कीजिए। उत्तर प्रदेश का कुल क्षेत्रफल दो लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा है। यहां देश की कुल आबादी का 16 फीसदी हिस्सा सात प्रतिशत से भी कम भूभाग में रहता है। बीस करोड़ की जनसंख्या वाला यह राज्य आबादी में ब्राजील और पाकिस्तान जैसा है, मिस्र और इथियोपिया से भी बड़ा है, दक्षिण अफ्रीका से चार गुना विशाल है और आबादी के मामले में देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र का लगभग दोगुना है।
यह राज्य 71 जिलों और 300 उप ब्लॉक में बंटा है। मैकियावेली ने कहा था कि राज्य और व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी, यह कानून पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक इकाइयों पर निर्भर करता है। यदि ये प्रशासनिक इकाइयां पहुंच के दायरे में होंगी, तभी कानून और व्यवस्था प्रभावी होंगी। उत्तर प्रदेश में 1,07,452 गांव हैं, जो बिहार और महाराष्ट्र के कुल गांवों से भी ज्यादा हैं। यानी अगर कोई ग्रामीण विकास मंत्री राज्य के दस फीसदी गांवों में भी जाना चाहे, तो उसे 10,745 गांवों में जाना होगा। अगर वह मात्र एक फीसदी गांवों में जाना चाहे, तो उसे 1,074 गांवों में जाना पड़ेगा। एक हजार से ज्यादा गांवों में घूमने में उसे कितने दिन लगेंगे!
उत्तर प्रदेश आकार में इतना बड़ा है कि इस पर प्रभावी शासन करना मुश्किल है। मानव विकास और आर्थिक विकास सूचकांक से इसकी विफलता अच्छी तरह प्रदर्शित होती है। यहां नवजात मृत्यु दर प्रति हजार में 53 है। यदि उत्तर प्रदेश एक देश होता, तो यह भारत (नवजात मृत्यु दर 42) के मुकाबले करीब 20 पायदान नीचे तो होता ही, सूडान, ताजिकिस्तान और कई सब-सहारा देशों से भी नीचे होता। यहां प्रति एक लाख बच्चों के जन्म के दौरान 292 माताएं जान गंवा देती हैं। इस मोर्चे पर उसकी स्थिति म्यांमार, समोआ और होंडुरास से भी बदतर है। यहां दस में से चार बच्चों का जन्म बिना किसी चिकित्साकर्मी की देखरेख में होता है। ऐसे में, उसका आर्थिक सूचकांक के मामले में नीचे होना चौंकाता नहीं है। प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आंकड़े के आधे से भी कम और ओडिशा जैसे राज्यों से भी बदतर है। वह सिर्फ बिहार से बेहतर स्थिति में है।
ऐसे में, आश्चर्य नहीं कि राज्य के 71 में 34 जिले पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष की सूची में शामिल हैं। पिछले 15 वर्षों से हर पंचवर्षीय योजना में राज्य का निम्नतम आर्थिक विकास राष्ट्रीय औसत को घटा देता है। जबकि बेहतर भूजल स्तर, नदी जल की पर्याप्त उपलब्धता और मिट्टी की गुणवत्ता के कारण उत्तर प्रदेश विश्व में एक बड़े अनाज उत्पादक क्षेत्र के रूप में उभर सकता है। वर्ष 2011 की जनगणना के पारिवारिक सर्वे को पंचायत एवं जिला परिषद के सदस्यों, विधायकों और सांसदों को जरूर पढ़नी चाहिए। जनगणना आंकड़ों के मुताबिक, सूबे की महज 36 फीसदी आबादी को ही बिजली मिल पा रही है, जबकि दस में छह लोग अपने घरों में रोशनी के लिए केरोसिन तेल पर निर्भर हैं। तथ्य यह भी है कि देश में 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, जिसमें से हर पांचवां व्यक्ति उत्तर प्रदेश का है।
यह उस राज्य का हाल है, जिसने पंद्रह में से दस प्रधानमंत्री दिए हैं! चाहे 1967 में लोहियावादियों का कांग्रेस को परास्त करने का मामला हो या हाल के दौर में मुलायम सिंह और मायावती जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों का कांग्रेस को दो दशक से राज्य की सत्ता से बाहर रखना, राजनीतिक रूप से भी यह राज्य सक्रिय रहा है। पर राजनीतिक रसूख और प्रभाव का यहां के लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ। उल्टे उनकी स्थिति बिगड़ती ही गई है। 1960 में देश के बदतरीन सौ जिलों में उत्तर प्रदेश के सत्तरह जिले शामिल थे, उनमें से सोलह जिले नई सहस्राब्दी में भी जस के तस हैं!
दरअसल उत्तर प्रदेश के बड़े आकार ने ही यहां एक बदतर किस्म की राजनीति पैदा की है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की बड़ी आबादी के लाभ की बात कही। बेशक एक बड़ी युवा आबादी विकास के लिए जरूरी है, पर सिर्फ युवा आबादी ही पर्याप्त नहीं है। विकास के लिए शासन चाहिए और शासन, राज्य और वहां के आखिरी आदमी तक सहूलियतों की पहुंच से निर्धारित होता है। राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए बेहतर यही होगा कि इसे तीन अलग-अलग राज्यों में बांट दिया जाए।
अगर बड़ी आबादी का सही ढंग से नियोजन नहीं किया गया, तो यह लाभ के बजाय किस तरह विनाश में परिणत होता है, उत्तर प्रदेश इसकी जीवंत प्रयोगशाला है।