बार-बार लगने वाले फौजी शासन का पाकिस्तान पर एक रोचक असर यह पड़ा है कि वहां की जनता को मुश्किल हालात में भी लतीफों के रास्ते अपनी बात कह जाने की महारत हासिल हो चुकी है। जनरल मुशर्रफ के खौफनाक राज में तो राजनीतिक व्यंग्य को ऐसी धार मिली कि उसके सामने भारत के बड़े से बड़े व्यंग्यकारों की कलम भी रश्क के मारे नीली पड़ जाए। जनरल साब के खिलाफ मुंह खोलने वाले शख्स को जेल में ठूंसा जाना वहां आम बात थी।
ऐसे ही एक शख्स को पेश करते हुए एक सरकारी वकील ने जज को बताया कि माई लार्ड! यह आदमी सड़क पर खड़े होकर चिल्ला रहा था, ‘यह शख्स पाकिस्तान के नाम पर कलंक है। इस्लाम का दुश्मन है। यह देश को बर्बाद कर रहा है।’ लिहाजा इसे सदर साब के खिलाफ बगावत करने के लिए कम से कम दस साल की कैद सुनाई जानी चाहिए।’
जज साहब ने सवाल उठाया, ‘इस आदमी ने सदर साब का नाम तो लिया नहीं...’ सरकारी वकील ने तपाक से कहा, ‘माई लार्ड! सदर साब के अलावा और कौन है, जो इस्लाम का दुश्मन है, या जो पाकिस्तान को बर्बाद करने पर तुला हुआ है?’
शुक्र है कि जिस खेल में पाकिस्तान का आम आदमी अभी तक चैंपियन बना हुआ था, उसमें भारतीय आम आदमी का सबसे मशहूर प्रतिनिधि भी लंगोट कसकर उतर आया है। हमारे राष्ट्रपति महोदय ने वोटरों को लुभाने के लिए टीवी और गमछे बांटने, पानी के बिल माफ करने और सड़क-छाप राजनीति करने वाले नेताओं पर निशाना साधने का ठीक वैसा साहस दिखाया, जैसा किसी परिवार के समझदार मुखिया से उम्मीद की जानी चाहिए।
लेकिन अगली शाम राष्ट्रपति महोदय की बुलाई चाय पार्टी में ही केजरीवाल ने राष्ट्रपति की नसीहत को चुनौती देने की घोषणा कर दी। अपने साथी के इस बड़बोलेपन से पैदा होने वाली फजीहत को भांपते हुए योगेंद्र यादव ने पत्रकारों को समझाने की कोशिश की कि राष्ट्रपति जी ने केजरीवाल सरकार पर नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी की है।
मगर वह यादव जी से पूछ रहे हैं कि राष्ट्रपति ने जिस अराजकतावादी की बात की है, वह भला मेरे अलावा और कौन हो सकता है? भला ऐसा कैसे हो सकता है कि राष्ट्रपति जी को अपने शहर में बंटता हुआ मुफ्त पानी दिखाई न दे, पर 2,197 किमी दूर जयललिता के बांटे हुए मुफ्त टीवी दिखाई दे जाएं? जवाब राष्ट्रपति जी को देना है या जनता देगी?