हम तो ऐसे कथित उदारपथियों को धन्यवाद ही देंगे कि अगर आप इस ‘विश्वगुरु’ के ‘देसीपन’ पर ऐसे ही हंसते और विलाप करते रहे तो कहीं आपकी ऐसी ‘भाखा’ ही न फल जाए। सच सर जी! ये दिन ऐसे ‘उलट मार’ वाले दिन हैं ः जिसको जितना गरियाया जाता है, जितना मजाक उड़ाया जाता है, पब्लिक उसको उतना ही चाहने लगती है।
इसी तर्क से हमारे ‘विश्वगुरु’ दो बार जीत चुके हैं और निंदकों की ऐसी ही अमोघ कृपा रही तो चौबीस में भी यही ‘गुरुणाम् गुरु’ यानी विश्वगुरु ही आ रहे हैं। विश्वगुरु के सबसे बड़े शुभचिंतक उनके ‘चिरनिंदक’ ही हैं। तज्जन्य अंधता के चलते उनकी ‘नफरतिया नजर’ विश्वगुरु के ‘जल्वे’ को कायदे से पढ़ भी नहीं पाती। फिर, ‘विश्वगुरु’ का आइडिया अपने आप में ‘बिग आइडिया’ है, जो इंडिया से कहता है कि एक गाल पर पड़ने के बाद दूसरे गाल को आगे करने के दिन गए। अब तो उस हाथ को पकड़ने और पलटकर मार देने के दिन हैं। कभी पश्चिम का वक्त था, अब अपना टाइम आएला है।
सब ‘सोचने’ की लीला है। जैसा सोचते हो वैसा बनते हो। तय कर लो कि तुम्हें मैकाले का चेला बने रहना है या अपना गुरु आप बनना है। यह तीसरी दुनिया के डिकॉलोनाइजेशन का दौर है प्यारे। कब तक मैकाले के जूतों में बैठकर सोचोगे। लेकिन सर जी! आप समकालीन ‘सांस्कृतिक राजनीति’ के इस मर्म को कभी न समझ सकेंगे कि जब आपका ‘विश्वगुरु’ कहता है कि ये इंडिया की शताब्दी है, तो आम हिंदू ‘बजरंगी’ बनने लगता है और आठ सौ साल पुराने ‘घावों’ का इलाज ढूंढने लगता है।
विश्वगुरु के चेले आपसे कहेंगे कि सर जी! जब तक ‘गजवा-ए-हिंद’ का खतरा है, धमकी है, चुनौती है, तब तक गरम हिंदुत्व है और उसका एजेंडा है। हिंदुत्व अपने आप ‘जबर’ नहीं बना। उसके ‘अन्य’ की चुनौती ने उसे ‘जबर’ बनाया है। आप जितना हिंदुत्व को और उसके विश्वगुरु को ठोकोगे, उतना ही वह जबरदस्त बनेगा। विश्वगुरु एक जबरदस्त आइडिया है, यानी योग विश्वगुरु, आयुर्वेद विश्वगुरु, आत्मनिर्भर भारत विश्वगुरु यानी सबका साथ सबका विकास वाला विश्वगुरु, जनता को राष्ट्र निर्माण के ‘बडे़ विचार’ में शामिल करने वाला, प्रेरित करने वाला, आम जनता से ‘थाली’ बजवाने वाला और सबको टीका लगाकर बचाने वाला विश्वगुरु।
विश्वगुरु यानी ताकतवर राष्ट्रवाद का च्यवनप्राश, ‘जब जीरो दिया मेरे भारत ने’ का भारत यानी एक गर्वोन्नत भारत, एक रुतबेदार फैंटेसी का भारत और उस फैंटेसी से प्रेरित आम आदमी का भारत, क्योंकि विश्वगुरु एक सपना है और सपने देखे बिना ‘सपना’ भी तो नहीं दिखता। यह विश्वगुरु जरा हट के है। वह मीडिया प्रेमी है। वह छवि से खेलता है। वह हर अवसर को बिग शो में बदल देता है। वह संघ का उत्पाद है। वह ‘हिंदुत्व’ का उत्पाद है और वह बिना मिलावट वाला ‘हिंदू हृदय सम्राट’ है।
अब जरा चौबीस के चुनावी हिसाब किताब कर लें :
विपक्ष न एक है, न हो सकता है। अगर हो भी जाए तो टिकाऊ नहीं हो सकता। बिना बिग आइडिया के विकल्प नहीं बनता। विपक्ष के पास- मोहब्बत की दुकान, गंगा जमुनी तहजीब या भाईचारे का एक ‘खर्च’ हो चुका आइडिया है। ज्ञानवापी और ‘सर तन से जुदा’ के दिनों में वह भरोसे लायक भी नहीं दिखता। और, इस टिप्पणी का अनंतिम बिंदु यह है कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का समकालीन एजेंडा जब तक पूरी तरह ‘एक्जॉस्ट’ नहीं हो जाता (थक नहीं जाता) तब तक उसे रहना ही है। इसलिए हम हंसें या रोएं, आना विश्वगुरु को ही है, किसी चेले को नहीं।