इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार के चुनाव में बदलाव की जबरदस्त आंधी चल रही थी और नरेंद्र मोदी इसके वाहक बने। लेकिन सवाल यह है कि ऐसा कैसे हुआ और कैसे उसे वोट में परिवर्तित किया जा सका? इसका एक ही कारण नजर आता है, देश का युवा वर्ग परिवर्तन का हथियार बना है। इस बार जिस तरह से 10 से 15 फीसदी तक ज्यादा मतदान हुआ, उससे यह साबित हो गया कि बिना युवावर्ग की शिरकत के इतना बड़ा परिवर्तन संभव नहीं था। वे खुद तो सड़कों पर आए ही, पुरानी पीढ़ी को भी घरों से निकलने को विवश किया। भारत में 15 करोड़ तो पहली बार वोट डालने वाले मतदाता ही थे, जो लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी के जोश से लबरेज थे, उसके अलावा उतने ही लोग 30 से कम उम्र के थे। यही वर्ग मोदी की जीत के लिए जिम्मेदार है।
हमारे यहां राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं की भागीदारी 1977 के बाद इसी बार हुई है। वर्ष 1989 और 1991 के चुनाव में भी युवाओं से जुड़े मुद्दे केंद्र में थे, लेकिन तब उनकी भागीदारी खंडित थी। 2010 के बाद अरब देशों में लोकतंत्र के लिए युवाओं में एक नई कुलबुलाहट सुनाई दी, तो उसका असर भारत पर भी पड़ा। अब तक जो युवा राजनीति शब्द से नफरत करते थे, वे राजनीति में सक्रिय होने के ख्वाब देखने लगे। नए आर्थिक परिदृश्य और नई टेक्नोलॉजी ने विश्व भर के युवाओं को जोड़ने का काम किया। जब वे उन्नत देशों के साथ अपनी तुलना करते, तो पाते कि हमारी तमाम खामियों के लिए हमारी राजनीति दोषी है। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दम भरते हैं, पर हमारा लोकतंत्र भीतर से खोखला होता जा रहा है। उसमें वंशवाद है, भाई-भतीजावाद है। हमारे यहां आर्थिक सुधार लागू हुए, पर उनका सुफल केवल मुट्ठी भर लोगों ने चखा। लोकतांत्रिक पूंजीवाद की जगह हमने क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना पूंजीवाद विकसित किया।
कोटा-परमिट राज खत्म जरूर हुआ, पर इंस्पेक्टर राज अब भी बरकरार है। कहां तो उम्मीद थी कि आर्थिक सुधारों की वजह से भ्रष्टाचार दूर होगा, कहां इस नव-पूंजीवाद ने भ्रष्टाचार को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। जब हमारे युवा वर्ग ने देखा कि अपनी छद्म राजनीति की वजह से उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना नीचा देखना पड़ता है, तो उसने राजनीति में शिरकत करने का फैसला किया।
2009 के चुनाव में राहुल गांधी युवा वर्ग की आशाओं के केंद्र में थे। तब वह पार्टी और राजनीति में आमूल बदलाव की बात किया करते थे। इसीलिए युवाओं ने संप्रग को 2004 से भी ज्यादा सीटें दीं। लेकिन जब उन्होंने पाया कि इन पांच वर्षों में कांग्रेस की हालत बदतर हो गई है, शासन में भ्रष्टाचार और जड़ें जमा रहा है, तब राहुल गांधी से भी उनका मोहभंग हुआ।
इसे हवा देने में अन्ना आंदोलन की बड़ी भूमिका रही। इसी बीच युवाओं में नरेंद्र मोदी का नाम सामने आया, जिसने गुजरात में शासन की नई मिसाल कायम की थी। इसी दौर में अन्ना आंदोलन से जन्मे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी दिल्ली में अप्रत्याशित कामयाबी दर्ज कर साबित किया कि युवा राजनीति को सुधारने के लिए घर से बाहर निकल पड़ा है। लेकिन सत्ता के लिए केजरीवाल की अधीरता और सरकार चला पाने में उनकी विफलता ने यह भी संदेश दिया कि केवल नेक इरादे होना पर्याप्त नहीं है। उसे अंजाम देने का अनुभव होना भी जरूरी है।
युवाओं को नरेंद्र मोदी में वे सब गुण दिखाई दिए, जिनकी उन्हें तलाश थी। कुल मिलाकर, यह जीत युवाओं की जीत है। देश की राजनीति का ढर्रा बदल चुका है। पुराने फॉर्मूले अप्रासंगिक हो चुके हैं। जाति-धर्म और सांप्रदायिकता की जगह अब सिर्फ सुशासन और विकास की राजनीति चलेगी।