केंद्र सरकार ने वर्ष 2018-19 के बजट में 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से एक बड़ी योजना की घोषणा की थी। कई राजनीतिक विश्लेषकों ने साहसिक कदम बताकर इसका स्वागत किया। लेकिन बहुत जल्दी जैसे ही इस योजना (आयुष्मान भारत) की रूपरेखा सामने आई, कई राज्यों ने इसे खारिज कर दिया। ओडिशा, तेलंगाना, दिल्ली, पंजाब और केरल ने योजना को अपूर्ण बताया। इन सभी राज्यों ने अपनी स्वयं की योजना को ज्यादा व्यापक पाया, भले ही इसका मतलब केंद्रीय निधि का नुकसान था, जो उनके राज्य में खर्च होती। इसने एक बार फिर सार्वजनिक धन खर्च करने में केंद्र की नीति से संबंधित पहले के विवादों को पुनर्जीवित कर दिया है।
हमारे संविधान के तहत केंद्र और राज्यों की विधायी शक्ति को संविधान के अनुच्छेद 246 में परिभाषित किया गया है। इसके तहत सातवीं अनुसूची में सूची एक, सूची दो और सूची तीन दी गई है। पहली सूची केंद्र की विधायी शक्तियों से संबंधित है, दूसरी सूची में ऐेसे क्षेत्र हैं, जिन पर राज्य कानून बना सकते हैं। सूची तीन समवर्ती सूची है। केंद्र और राज्य, दोनों इसमें बताए गए विषयों पर कानून बना सकते हैं, लेकिन प्रधानता केंद्रीय कानून को है। इसके बावजूद, अधिकांश केंद्र प्रायोजित योजनाएं राज्यों की विधायी क्षमता में आने वाले विषयों से संबंधित हैं।
राज्य सूची में आने वाले विषयों पर योजनाएं शुरू करने का केंद्र सरकार का उत्साह कई कारकों पर निर्भर करता है। सबसे पहले, शिक्षा और स्वास्थ्य के कई संकेतकों में हमारा प्रदर्शन बहुत खराब है। सहस्राब्दी विकास लक्ष्य के तहत हमारी कुछ प्रतिबद्धताएं हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में धन उपलब्ध कराया जाना महत्वपूर्ण है, ताकि प्रदर्शन को सुधारा जा सके। दुखद है कि अगर केंद्र इन क्षेत्रों में योजनाएं शुरू नहीं करता है और दिशा-निर्देशों के बिना राज्य सरकारों को धन हस्तांतरित करता है, तो राज्य इन राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर खर्च नहीं कर सकते हैं।
दूसरी बात, कुछ बुनियादी जरूरतें और बुनियादी ढांचे हैं, जो सभी नागरिकों, खासकर गरीबों के लिए आवश्यक हैं। इसमें सस्ती कीमत पर अनाज, ग्रामीण सड़क, ग्रामीण आवास, पेयजल, बिजली तक पहुंच, रोजगार के अवसर और बढ़ती क्षेत्रीय असमानताएं शामिल हैं। इन क्षेत्रों में समस्याएं होने पर केंद्र मूकदर्शक बना नहीं रह सकता। तीसरी बात, राज्यों और केंद्र में सत्ता पर कब्जा के लिए बढ़ते संघर्ष के साथ विभिन्न राजनीतिक दल ऐसी योजनाओं को लॉन्च करना पसंद करते हैं, जो उन्हें वोट दिला सके। चूंकि लोगों (मतदाताओं) के जीवन को प्रभावित करने वाले क्षेत्र आम तौर पर राज्य के हिस्से में हैं, केंद्र इन क्षेत्रों में प्रधानमंत्री योजना का नाम देकर योजनाएं शुरू करने की कोशिश करता है। यह स्पष्ट है कि इन योजनाओं के लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार है और उसे इस योजना के तहत नागरिकों द्वारा प्राप्त लाभों का श्रेय दिया जाना चाहिए। राज्यों ने समान उद्देश्य के लिए केंद्रीय योजनाओं के अनुकरण में अपनी योजनाओं को मुख्यमंत्री योजना का नाम देने की कोशिश की। कई बार राज्य केंद्रीय निधियों का नुकसान उठाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनका लाभ केंद्र में बैठी पार्टी को मिलता है। एनडीए सरकार के आने के बाद सुशासन के हिस्से के रूप में केंद्र प्रायोजित योजनाओं को तेजी से कम करने पर जोर दिया गया। लेकिन शीघ्र ही केंद्र सरकार द्वारा नई योजनाओं की घोषणा की गई। इनमें से कई स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, कृषि, शहरी विकास, सिंचाई और मध्यम और लघु उद्योग (सभी राज्य के विषय) से संबंधित हैं। नतीजा यह हुआ कि राज्य के अधिकार क्षेत्र के विषयों में केंद्र प्रायोजित योजनाएं फिर से बढ़ गईं।
राज्य विभिन्न आधार पर इसका विरोध करते हैं। पहला, तो यह कि हमारे जैसे विविध और बड़े देश में विभिन्न क्षेत्रों की विकास जरूरतें अलग-अलग हैं। राज्यों से एक समान दृष्टिकोण वाली इन योजनाओं को लागू करने के लिए कहना उनकी निजी विकास खाई की अनदेखी करना है। दूसरा, देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय स्थितियां अलग-अलग हैं। ये योजनाएं इस पर विचार किए बिना एक समान प्रावधान और दिशानिर्देश बनाती हैं। अक्सर इन योजनाओं के तहत निर्धारित मानदंडों को राज्यों में सार्थक क्रियान्वयन के लिए बदलने की जरूरत होती है। पर केंद्रीय योजनाओं में इस लचीलेपन का अभाव होता है।
तीसरा, चूंकि इनमें से ज्यादातर योजनाएं राज्य के अधिकार क्षेत्र से संबंधित होती हैं, इसलिए राज्य अपनी योजनाओं को विकसित करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं। वे चाहते हैं कि केंद्र अपनी जरूरतों के अनुसार धन के प्रभावी उपयोग के लिए सभी संसाधन उन्हें स्थानांतरित कर दे, जो हमारी नीति की संघीय प्रकृति के अनुरूप है। इससे यह होगा कि योजनाओं को राज्यों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाएगा और धन का उपयोग अधिक उत्पादकता के साथ किया जाएगा।
हमारी स्वतंत्रता के शुरुआती पांच दशकों में राज्यों की वित्तीय स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। पिछले दो दशकों में उनकी वित्तीय स्थिति में लगातार सुधार हुआ है, क्योंकि वित्त आयोग द्वारा की गई कई सिफारिशों को केंद्र सरकार ने समर्थन दिया। केंद्र द्वारा कुछ पूर्ववर्ती योजनाओं के वित्तपोषण में गिरावट के चलते राज्यों के संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव के बावजूद उनके समग्र संसाधन में वृद्धि हुई। इसने उन्हें केंद्रीय वित्त पोषण और केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को चुनावी लाभ देने वाली योजनाओं को खारिज करने के लिए वित्तीय मजबूती प्रदान की। कुछ राज्यों द्वारा आयुष्मान भारत के विरोध के पीछे कुछ हद तक उनकी यही धारणा हो सकती है। लेकिन ऐसा रवैया विकास के लिए ठीक नहीं है।
स्पष्ट है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत राज्यों को संसाधन वित्तीय स्थानांतरण के जरिये होना चाहिए, जिसमें राज्यों को कुछ लचीलापन मिलना चाहिए। ऐसी योजनाओं का निर्माण राज्य के विकास को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर यह कई विकास समस्याओं का समाधान करेगा। लेकिन इसे राजनीतिक एजेंडा बनाना और प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नाम देना राष्ट्रीय विकास रणनीति की प्रभावशीलता को नष्ट कर देगा।