कश्मीर के पुलवामा में एक आतंकवादी ने अपनी कार बम को सीआरपीएफ की बस से टकराकर चालीस जवानों की जान ले ली। सुरक्षा विशेषज्ञ इसे एक खतरनाक संकेत बता रहे हैं, क्योंकि भारत में यह अपनी तरह का पहला विस्फोट था, जिसमें 350 किलो बारूद का इस्तेमाल किया गया। लेकिन बम का वजन गिनाते हुए हम सब 70 किलोग्राम के उस बारूद को गिनना भूल गए, जो इस कार बम का असली डेटोनेटर था। इस बारूद का नाम था आदिल अहमद डार वल्द गुलाम अहमद डार और फहमीदा डार, उम्र बीस साल, निवासी कश्मीर घाटी का गांव लेथीपुरा। यानी पूरे बम का वजन था 420 किलोग्राम। अब सवाल है कि यह चार सौ बीसी किसके साथ हुई? कश्मीरी जनता के साथ, भारत के साथ, आदिल के साथ, गुलाम मियां और फहमीदा बेगम के साथ या फिर सबके साथ?
यह पहला मौका है, जब कश्मीर में सत्तर साल से चली आ रही हिंसा और अशांति में किसी इंसान को कार बम की तरह ठीक वैसे ही इस्तेमाल किया गया जैसा, अब तक सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सीरिया जैसे इस्लामी मुल्कों में ‘असली इस्लाम बनाम नकली इस्लाम‘ की लड़ाई में किया जाता रहा है। धीरे-धीरे छन कर सामने आ रही बातों से पता चल रहा है कि आदिल एक गरीब कश्मीरी परिवार से था, जो कुछ मुल्ला मौलवियों और आतंकवादियों के फंदे में फंसकर उनकी सियासत का बारूद बनने को तैयार हो गया।
मरने वालों की लिस्ट में आज तक किसी नेता अब्दुल्ला, मुफ्ती, गिलानी या मलिक के बेटे का नाम नहीं आया। डार परिवार को पता ही नहीं चल रहा कि उनका बेटा कब जैश-ए-मोहम्मद के हाथ पड़ा और कैसे उसे आतंकवादी बना दिया गया। लेकिन जैश-ए-मोहम्मद के आकाओं के लिए आदिल का फोटो पाकिस्तानी हुक्मरानों और जनता से पैसे बटोरने का जैकपॉट बन चुका है। आतंक और झूठ पर पलने वाले मरियल संगठन हुर्रियत को भी थोड़ा-सा और ग्लूकोज मिल गया। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेताओं ने पहले तो इस घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण‘ बताकर अपना शोक जताया। लेकिन धीरे-धीरे वे भी हुर्रियत की तर्ज पर आदिल की ‘शहादत‘ में से राजनीतिक दूध दुहने की पुरानी होड़ में जुट गए हैं।
आदिल तो चला गया। पर उसकी मौत के विस्फोट ने कश्मीर के भीतर धीरे-धीरे खड़ी की गई धोखे की दीवार को गिराकर एक डरावने सच को नंगा कर दिया है। भारत के इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य में वहां के ये कश्मीरी खिलाड़ी यह समझने को ही तैयार नहीं हैं कि उन्होंने शेष भारत के मुस्लिम समाज की छवि पर कितना बड़ा बट्टा लगाया है। पिछले सत्तर साल में जिस तरह से उन्होंने कश्मीर घाटी से किस्त-दर-किस्त वहां के गैर मुस्लिम नागरिकों को भगाया है, उसने शेष भारत के सामने बहुत खराब उदाहरण पेश किया है कि जहां-जहां मुस्लिम समाज बहुमत में आएगा, वहां गैर मुस्लिमों के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा।
कश्मीर का इतिहास दिखाता है कि इससे भी बुरा दुर्भाग्य कश्मीर घाटी से भगाए गए पंडितों, सिखों और दूसरे कई समाजों को भी झेलना पड़ा। लेकिन उन समाजों ने दूसरे समाजों के साथ मिलकर रहने और अपने लिए तरक्की का रास्ता चुनकर अपने लिए नई जगह भी बना ली है और अपना भविष्य भी संवारा है। लेकिन कश्मीर की मौजूदा पीढ़ियों का यह दुर्भाग्य रहा कि उनके नेताओं ने उनका इस्तेमाल अपने लालच की तोप के बारूद की तरह किया है। उनके लिए किसी भी कश्मीरी युवा की हैसियत कार में भरे 350 किलो बारूद में 70 किलो के डेटोनेटर से ज्यादा कुछ नहीं रह गई। क्या आपको लगता है कि कश्मीर के साथ इस चार सौ बीसी के लिए इतिहास कश्मीरी नेताओं को कभी माफ करेगा?