रंग फैशन का एक महत्वपूर्ण तत्व है। हम हर साल या हर मौसम में जिन रंगों को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं, फैशन ही उन्हें निर्धारित करता है। फैशन के रंग दरअसल कोड की तरह होते हैं, जो किसी देश का मूड तय करते हैं। बात सिर्फ एक खास रंग की नहीं है, बल्कि हर तरह के राजनीतिक संदेश की है, जो ज्यादा लोगों तक फैशन के जरिये पहुंचाए जाते हैं। आने वाले चुनावों में भी राजनीतिक दलों द्वारा सोशल मीडिया क्रिएटर्स के साथ विज्ञापनों इत्यादि पर भी लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाएंगे। ताकत और पैसे का भरपूर प्रदर्शन होगा।
कॉमनवेल्थ ऐंड कम्परेटिव पॉलिटिक्स में 2022 में प्रकाशित शोधपत्र में सिमोना विटोरिनी लिखती हैं, ‘ऐसे समय में, जब राजनीति में किसी सर्वमान्य विचारधारा का अभाव है और उत्तर-आधुनिक विमर्श राष्ट्रवाद के नए स्वरूप को स्थापित कर रहा है, राजनीति काफी आकर्षक और व्यावसायिक हो गई है, नतीजतन न केवल लोकप्रिय वोटों को पाने के तरीकों में बदलाव आया है, बल्कि लोकप्रिय भावनाओं को संगठित करने और भुनाने के तरीके भी बदल गए हैं।’
विटोरनी अपने शोधपत्र में आगे लिखती हैं, ‘लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के तरीके और जनमत निर्माण की प्रक्रिया पहले जैसी पारंपरिक नहीं रही और केवल भाषण ही संवाद का जरिया नहीं है। अब कपड़ों के चयन, रंगों एवं अन्य माध्यमों से मतदाताओं के अवचेतन को प्रभावित किया जा रहा है।'
यहां मेरा मतलब किसी पार्टी या विचारधारा का विरोध या समर्थन करना नहीं है। निश्चित रूप से कोई राजनेता जब आइकन बन जाता है, तो उसकी हर बात फैशन स्टेटमेंट बन जाती है, चाहे वह खाना हो, पहनना हो या चलना। हमारे प्रधानमंत्री मोदी इसका बहुत अच्छा उदाहरण हैं। उनके पहनावे को लोगों, खासकर युवाओं द्वारा खूब अपनाया जा रहा है और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर बड़ा मुद्दा यह है कि भारतीय फैशन जगत को इस अंधानुकरण से कैसे बचाएं एवं इसकी मौलिकता और रचनात्मकता को रंग, शैली या किसी भी राजनीतिक प्रभाव से कैसे बचाए रखें? बाजार के ट्रेंड से हटकर चलना और डिजाइन में राजनीतिक रंगों, स्टाइल और पैटर्न की नकल से बचना या फिर उसे कम-से-कम करना, वास्तव में चुनौती है।
किसी विचार को उन्माद बनने में समय नहीं लगता और फैशन के संबंध में भी यह बात उतनी ही सही है। यह निश्चित रूप से बराबर की तुलना नहीं है, लेकिन बहुत पुरानी बात नहीं है, जब बार्बी, जो एक मूवी थी, 'पिंक कल्ट' बन गई। जल्दी ही बार्बी एक गुड़िया से वॉलपेपर पैटर्न, केक और यहां तक कि कारों पर नजर आने लगी। विभिन्न उत्पादों की पैकेजिंग और उपभोक्ता उत्पाद, जैसे कि टूथब्रश, तौलिया सब 'बार्बीमय' हो गए और बाजार ने पिंक की एकरसता व एकरूपता को लंबे समय तक देखा।
ऐसे समय, जब उपभोक्ता को किसी उत्पाद या सेवा को सीधे खरीदने के लिए प्रेरित न कर कंपनियां व विज्ञापन एजेंसियां विभिन्न सर्वेक्षणों के माध्यम से उन्हें निर्णय प्रक्रिया में सहभागी बना रही हैं (ताकि उपभोक्ता को यह भ्रम हो कि उसने 'इनफॉर्म्ड चॉइस' ली है), कंप्यूटर के 'क्लिक' और मोबाइल के 'सिलेक्ट' बटन की ताकत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। ऐसे में, फैशन-इंफ्लुएंसर्स, ब्लॉगर्स की महत्ता फैशन ट्रेंड सेट करने में और भी बढ़ गई है।
आज का दौर वास्तव में प्रचार और आक्रामक मार्केटिंग का है। दुनिया भर में फैशन से ज्यादा बड़ी मार्केटिंग रणनीतियां हो गई हैं और मूल उत्पाद से ज्यादा यह महत्वपूर्ण हो गया है कि कौन-सा सितारा उसका प्रमोशन कर रहा है और कहां इन्हें लॉन्च किया जा रहा है। भारत के संदर्भ में देखें, तो कला, शिल्प, वस्त्र, फैशन-सबकुछ चुनाव के विभिन्न पक्षों से प्रभावित होता दिखता है। ऐसे में, फैशन शो की विशेषता और प्रदर्शनियों की पहचान बनाए रखने के लिए फैशन जगत को वैसे थीम और उत्पादों से बचना चाहिए, जो किसी एक राजनीतिक पार्टी की विचारधारा को संपोषित करते हों।
वर्तमान भारतीय संदर्भ में रंगों का प्रभाव भी केवल वस्तुओं एवं उत्पादों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक संदेश एवं राजनीतिक संबद्धता का भी परिचायक हो गया है। चाहे बात केसरिया की हो, या नीले की, या पीले की, या किसी अन्य रंग की-सब किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े नजर आते हैं। केसरिया निश्चित ही ज्यादा प्रभावी एवं हर जगह नजर आ रहा है। लोगों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है और फैशन जगत भी 'मांग एवं आपूर्ति' के सिद्धांत से अछूता नहीं है।
लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय समाज समावेशी एवं धर्मनिरपेक्ष समाज रहा है और हमारे फैशन डिजाइनरों ने अपने रंगों, विषयों एवं आयोजनों में सूक्ष्म रूप से इन मूल्यों को संजोया एवं परिलक्षित भी किया है। रंग, डिजाइन और थीम किसी भी पोशाक को विशेषता प्रदान करते हैं और डिजाइनर डिजाइन के लिए कहीं न कहीं से प्रेरणा लेते ही हैं। जब सोशल मीडिया, टेलीविजन एवं अन्य दृश्य व श्रव्य माध्यम में एक ही तरह की विचारधारा का प्रचार-प्रसार हो एवं एक ही विषय-वस्तु की अधिकता एवं प्रभाव हो, तो डिजाइनर भी उससे अछूते नहीं रहते। अवचेतन मन पर वातावरण का प्रभाव तो पड़ता ही है और रचनात्मकता व मौलिकता के प्रभावित होने का भी खतरा रहता है। ऐसी स्थिति में अपनी मौलिकता को बचाए रखना एवं लीक से हटकर उन संदर्भों और विचारों पर आधारित वस्त्र डिजाइन करना, जो भेड़-चाल से अलग हो, और भी आवश्यक हो जाता है।
यह सही है कि भारत में अब भी अनिवार्य रूप से फैशन का मतलब पारंपरिक परिधानों के अति अलंकृत प्रस्तुति से लिया जाता है। लेकिन यह याद रखने का समय है कि यह वही उद्योग है, जो समावेशिता और विविधता के लिए खड़ा है। यह सामाजिक संदेश देने के लिए समय-समय पर नए तरीके खोजता है।
भारत के डिजाइनर सीधे नहीं, बल्कि सुझाव के रूप में अपनी बात रखते हैं, रचनात्मक प्रतिभाओं के उभरते समूह में ऐसे दिमाग भी हैं, जो विषय, रूपांकन और प्रस्तुति में अंधानुकरण से बचते हैं। भारतीय डिजाइनरों ने देश की बहुलता, समरसता और धर्मनिरपेक्षता को समय-समय पर परिधानों एवं थीम के जरिये दर्शाया है। इसलिए फैशन जगत से अपेक्षा है कि वह इस चुनावी वर्ष में अपने मूल्यों को समेट कर मौलिकता के हिसाब से नए-नए परिधानों एवं उत्पादों को लाएगा और बाजार को राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बनने से बचाने की कोशिश भी करेगा।