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फांसी के सियासी सवाल

Tue, 12 Feb 2013 12:04 AM IST
कुमार प्रशांत
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आठ फरवरी की रात को जो नहीं पता था, नौ फरवरी की सुबह वह पता था और उसने सारे देश को बताया कि अफजल गुरु को फांसी दे दी गई! संसद पर हमला करने का मामला इस फांसी के साथ विराम पा गया। लेकिन क्या सच में ऐसा माना जा सकता है? एक आजाद, लोकतांत्रिक देश में फांसी किसी षड्यंत्र का रूप क्यों ले रही है, इसकी पड़ताल होनी चाहिए।
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एक ऐसी सरकार, जो कुछ नहीं करने के लिए मशहूर रही है, अचानक फांसी देने में जुट जाए, तो हैरानी भी होती है और आशंका भी कि कहीं वह खुद को फांसी पर चढ़ा तो महसूस नहीं कर रही है! अपराध-बोध एक ऐसी अंधेरी खाई है, जिसमें आप डूबते हैं तो उबरना कठिन होता है। क्या यह सरकार ऐसे ही किसी बोध से ग्रसित है? या कि यह चुनाव-बोध है?

अजमल कसाब को फांसी पर चढ़ाए अभी दिन ही कितने हुए थे कि अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इससे ऐसा लगता है जैसे दोनों एक ही श्रेणी के अपराधी थे। लेकिन कसाब विदेशी हमलावर था। वह हत्यारा था और इसी काम के लिए पाकिस्तान ने उसे प्रशिक्षित कर भारत भेजा था, इसे साबित करने के लिए किसी गवाह की जरूरत नहीं थी। मुंबई की सड़कों, चश्मदीद गवाह, सीसी टीवी के कैमरे सब एक-सी ही गवाही दे रहे थे। हमने राष्ट्रीय मनोभावों पर काबू रखते हुए भी कसाब को वे तमाम कानूनी सहायता दी, जो संविधान में किसी आरोपी के लिए तय की हुई हैं।
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अफजल गुरु का मामला इससे भिन्न था। वह हमारे देश का नागरिक था। उसे संसद पर पाकिस्तानी हमले का मास्टर माइंड बताया गया। सरकारी कहानी में कई पेच हैं, जो उसके अपराध को खुलकर सामने नहीं आने देते। उस पर जिस तरह मुकदमा चला, जिस तरह गवाहियां हुईं, जिस तरह के प्रमाण पेश हुए और नहीं हुए, सब किसी-न-किसी स्तर पर यह गुंजाइश छोड़ते रहे कि क्या उसे पूरी सांविधानिक मदद मिली? लेकिन जैसे यह लगता रहा, वैसे ही यह भी लगता रहा कि अफजल गुरु संसद पर हमले से जरूर जुड़ा हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे फांसी की सजा सुनाई, तो हमने माना कि उसके लिए यही सजा न्यायपूर्ण है।

लेकिन फिर वही खेल शुरू हुआ, जो कसाब के साथ खेला गया था। उसे फांसी की प्रतीक्षा में बैठा कैदी बनाकर वर्षों रखा गया। क्या इस बारे में हमारा संविधान कुछ नहीं कहता है? और यदि नहीं कहता है, तो क्या हमारे न्यायालय को, हमारी संसद को भी यह नहीं लगता है कि जिसे फांसी जैसी सजा अंतिम तौर पर सुना दी गई है, उसे वैसी मनःस्थिति में लंबे समय तक रखना भी क्रूरता है।

किसी को फांसी पर लटकाना उस समाज की चौतरफा हार का सबसे जीवंत प्रमाण है। यह व्यक्ति में सुधार की सारी संभावनाएं ही खत्म नहीं करता है, बल्कि समाज की शुभ शक्तियों, परंपराओं और संभावनाओं के पराजय की भी घोषणा करता है। भारतीय जनता पार्टी ने दो व्यक्तियों की फांसी को देश का सबसे अहम सवाल बना रखा था, कांग्रेस ने आसन्न चुनावों को ध्यान में रखकर, उन दोनों को फांसी पर चढ़ा दिया और भाजपा के हाथों से एक बड़ा चुनावी मुद्दा छीन लिया। भाजपा समझ सके, तो समझेगी कि यह अयोध्या ढांचे के ध्वंस जैसा मामला है। जब तक मस्जिद कायम थी, वह एक साकार मुद्दा था। फिर उसने इसे गिरा दिया, तो उसे समझ में आया कि वह मुद्दा ही हाथ से निकल गया!

अफजल गुरु की फांसी उन सभी भारतीय नौजवानों से भी कुछ कहती है, जो आतंकी कार्रवाइयों से सरकार व समाज से अपनी बात मनवाना चाहते हैं। इन आतंकवादी युवाओं में भारतीय समाज का हर वर्ग है। जो जहां पिट रहा है और इससे लड़ने-बचने का कोई रास्ता नहीं खोज पा रहा है, वही आतंकवाद का सहारा ले रहा है।

सत्ता की लड़ाई में लगे राजनीतिक लोग भी आतंकवाद को सस्ता सौदा मान कर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए अफजल गुरु का वाकया हमें बताता है कि समाज व सरकार से शिकायत हो इसमें कोई अपराध नहीं है, उसके लिए आवाज उठाना भी कुफ्र नहीं है, लेकिन यह विवेक कभी खोना नहीं चाहिए कि अपनी आवाज, दूसरों की आवाज बंद कर उठाना अपराध है, उस लड़ाई की जड़ पर ही प्रहार है जिसे आप लड़ रहे हैं।

ऐसी लड़ाई जल्दी ही समाज के खिलाफ लड़ाई में बदल जाती है और आप उस व्यापक समाज की सहानुभूति खोने लगते हैं, जिसके नाम पर आप लड़ रहे होते हैं। जब ऐसी हालत होती है, तब सरकार नाम की उस संस्था को प्रवेश का मौका मिलता है, जिसके पास संविधानसम्मत अतिवादी गतिविधियों का लाइसेंस है।
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