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भैया! पहले मेरा भून दो

Mon, 03 Mar 2014 07:04 PM IST
अरविंद तिवारी
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हमें बचपन का अपना गांव याद आता है। महीने में एक बार भड़भूजा भाड़ तचाता था। पूरे गांव के लोग अनाज लेकर भुनाने निकलते थे। हमारे बालसखाओं की मान्यता थी कि ‘घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने’ कहावत का उत्स हमारा गांव ही है। आज यह मान्यता टूट गई है और मेरा दावा है कि इस कहावत का उत्स ‘चुनाव’ है। हर पार्टी मुद्दा भुनाने निकल पड़ी है। जिनके पास मुद्दे नहीं हैं, वे न जाने क्या-क्या भुना रहे हैं!
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इस बार भड़भूजा उदास है। वह मुद्दे भूनने आया था, मगर पार्टियां मुद्दे के नाम पर न जाने क्या-क्या भुनाने लगी हैं। वार्तालाप कुछ इस प्रकार होता है- ‘भैया पहले मुझे भून दो’। ‘क्या लाए हो।’ और क्या लाएंगे भ्रष्टाचार लाए हैं, दूसरी टोकरी में सांप्रदायिकता का मुद्दा पड़ा हुआ है।’ भड़भूजा हलकान है। चुनावी मुद्दों को भूनना आसान नहीं होता। ईंधन जल जाता है, मगर पार्टियां कहती हैं, अच्छे से नहीं भूना। मुद्दों को सुखाकर लाओगे, तो अच्छी तरह भुनेगा। नए मुद्दे गीले अनाज की तरह होते हैं, खूब कोशिश करो, भुनते ही नहीं।

भ्रष्टाचार का मुद्दा लिए तमाम पार्टियां खड़ी हैं। भड़भूजा कहता है, सबका भ्रष्टाचार एक साथ भून दूंगा, भुनने के बाद वजन के हिसाब से बांट लेना। पार्टियां तैयार ही नहीं होतीं। देसी, विदेशी, हाइब्रिड आदि तमाम किस्मों के भ्रष्टाचार हैं। हर पार्टी चाहती है कि उसका भ्रष्टाचार सबसे अधिक भुना जाए। भड़भूजा कहता है, पांच साल तक भ्रष्टाचार को पानी में डाले रखा, अब क्या खाक भुनेगा।
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इधर भड़भूजा भ्रष्टाचार को कढ़ाई में डालता है, तो हुक्म होता है, पहले सांप्रदायिकता के मुद्दे को भूनो। भ्रष्टाचार को कढ़ाई से बाहर निकालो। भड़भूजा चक्कर में पड़ जाता है। सांप्रदायिकता का मुद्दा कढ़ाई में ही आग पकड़ लेता है। वह भड़भूजे को ही जलाने लगता है। भड़भूजा बहुत परेशान है। उसके भाड़ को लेकर खींचतान चल रही है। वह ईंधन डालना ही भूल जाता है। परिणाम यह निकलता है कि एक भी मुद्दा ठीक से नहीं भुन पाता। तीसरा मोर्चा कहता है, हमारे मुद्दे सबसे ज्यादा सूखे हैं। हमें पहले भून दो। ये भुन भी जल्दी जाएंगे।

बहरहाल एक दूसरे का खेल बिगाड़ने के चक्कर में किसी का भी मुद्दा नहीं भुन पा रहा है। भड़भूजे को मजदूरी नहीं मिलती है। वह लोकसभा चुनावों तक भाड़ नहीं तपाएगा, भले ही भूखा रहना पड़े।
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