इन दिनों मेरे शहर में यदि किसी की चर्चा है, तो वह है क्रिकेट स्टेडियम की। विदेशी टीम यहां खेलने आएगी, तब आएगी, मगर स्टेडियम की तैयारियों को देखने के लिए लाइन लगी हुई है। मैच शुरू होने में हफ्ता भर है और काम इतने हैं कि पूछो मत। दस अधिकारी, पांच मंत्री, चार सांसद, आठ विधायक और बीस-पच्चीस इन्हीं के 'पूर्व' लोगों के नाम अवलोकन सूची में हैं।
नेता या अफसर कभी बगैर सूचना के क्रिकेट मैच की तैयारियां देखने नहीं जाते। उन्हें बताना पड़ता है, तभी वे समझते हैं कि क्या काम हो रहा है।
जी सर, यह पुताई चल रही है-ह्वाइट वॉश।
अच्छा। हम तो समझते थे कि स्टेडियम कभी पुतते ही नहीं हैं। क्या हर साल पुताई होती है?
नहीं सर। जब भी अंतरराष्ट्रीय मैच होता है, पुताई हो जाती है।
साल में कितने अंतरराष्ट्रीय मैच हो जाते हैं?
दो-चार साल में एक तो मिल ही जाता है, यदि पिच अच्छी हो तो। जवाब मिलता है।
तो पिच अच्छी क्यों नहीं बनाई जाती? बनाइए, दुनिया की सबसे अच्छी पिच बनाइए।...कहां है पिच? चलिए, हमें दिखाइए। देखते हैं, हम क्या कर सकते हैं। सब मैदान की तरफ चल पड़ते हैं।
हम कहां जा रहे हैं? हम पिच देखना चाहते हैं?
सर, पिच देखने ही जा रहे हैं। जवाब आता है।
यह क्या, पिच खुले में रखते हैं आप लोग? इतना बड़ा स्टेडियम है और पिच यहां खुले मैदान में? सब लोग पिच के पास पहुंच जाते हैं।
सर, यह रही पिच। बताया जाता है।
हूं...तो इसे कहते हैं पिच। अच्छी है। इस पर और ध्यान दिया जाना चाहिए। ये घास इतनी छोटी क्यों है? पानी डलवाइए। नहीं हो तो नगर निगम के टैंकर लगवा दीजिए।
दस-बारह लोगों का झुंड यहां-वहां भटकता, क्रिकेट मैच की तैयारियां दिखाता है। अफसर-नेता देखते हैं और दुनिया को बताने की कोशिश करते हैं कि उन्हें क्रिकेट समझ में आता है।
तैयारी दिखाने का यह सिलसिला कई बार इस कदर चलता है कि तैयारी ही अधूरी रह जाती है।