ईएमआई की कृपा से नई स्कूटी ली, तो मत पूछो कि कितनी खुशी हुई! इतनी खुशी तो घोड़ी चढ़ने पर भी नहीं हुई थी।
ज्यों ही पड़ोसियों के कानों में खबर पड़ी कि मैं स्कूटी वाला हो गया, तो वे बधाई देने आने लगे। उन्हें चाय पिलाने के चक्कर में दस किलो चीनी, दो किलो चाय पत्ती का खर्च इस महीने बढ़ गया, इसलिए घर का बजट भी गड़बड़ा गया।
बधाई देने वालों में जब पड़ोस के पुलिस विभाग वाले दोस्त आए, तो बधाई कम, नसीहत ज्यादा देते हुए बोले, ‘यार! माफ करना, तुम्हें नई स्कूटी की बधाई देने आना तो मुझे पहले था, पर नाके पर बड़ी मुश्किल से तैनाती हुई थी। तुम्हें शायद पता हो या न, कि नाके पर तैनाती के लिए हम पुलिस वालों को किस-किसके तरले नहीं करने पड़ते? साल में दो महीने नाके पर लग जाएं, तो बीस-बीस, तीस-तीस रुपये इकट्ठे नहीं करने पड़ते।’
‘चलो, कोई बात नहीं। पर अब मेरे स्कूटी का नंबर अपने विभाग वालों को नोट करवा देना, ताकि...’ मैंने उनकी ओर चाय का गिलास बढ़ाया, तो वह चाय का घूंट लेते बोले,‘देखो दोस्त! तुम्हारे लिए वैसे तो जान तक हाजिर है, पर...धंधे के वक्त कोई किसी का दोस्त नहीं होता।’
‘मतलब?’
‘सड़क पर चलने से पहले तुम्हारे पास लाइसेंस हो या न, स्कूटी के कागज हों या न, तो भी सब चलेगा ही नहीं, मजे से दौड़ेगा। लेकिन अगर जेब में दो चार सौ रुपये न हों, तो सारे कागजात होने के बाद भी नहीं चलेगा, तो नहीं चलेगा।’
‘मतलब?’
‘मतलब यह कि जैसे स्कूटी पेट्रोल के बिना नहीं चल सकती, उसी तरह तुम खाली जेब के स्कूटी पर नहीं चल सकते। क्या पता, कहां चालान करने वाले तुमसे टकरा जाएं। ऐसे में तुम कहो कि मेरा चालान हो गया, तो सच कहूं, बुरा मत मानना, मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पाऊंगा। इसलिए बेकार के लफड़े में पड़ने से बचने के लिए बेहतर है कि जेब में कुछ और रखना या नहीं, पर खुदा के लिए अपनी जेब खाली मत रखना।’