विदेश यात्रा के वक्त एशियाई नेताओं की स्टाइल कुछ संयमित और औपचारिक रहती है। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अंदाज कुछ निराला है। इसकी बानगी चीन की उनकी हालिया यात्रा के दौरान भी दिखी। बीते शुक्रवार को मोदी और उनके समकक्ष चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग प्रेस के सामने उन्हीं टिप्पणियों के साथ रूबरू हुए, जिनकी पहले से उम्मीद की जा रही थी। चीन के प्रधानमंत्री दोनों देशों के बीच सहयोग पर जोर दे रहे थे। मगर मोदी की टिप्पणी ताज्जुब में डालने वाली थी। बगैर किसी लाग-लपेट के उन्होंने चीन के नेताओं से कहा कि उन्हें दोनों देशों के बीच के रिश्तों को रणनीतिक और दीर्घकालीन नजरिये से देखना चाहिए। इस दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने यह संकेत भी दिया कि उन्हें महसूस होता है कि चीनी नेता फिलहाल ऐसा नहीं कर रहे हैं, और उनकी सोच भी अल्पकालीन हितों से प्रेरित है। उन्होंने अपनी बात की शुरुआत यह कहते हुए की, कि चीन को उन मुद्दों पर दोबारा विचार करना चाहिए, जो दोनों देशों के बीच सहयोग की राह में आड़े आते हैं। मोदी इतने पर रुकने वाले नहीं थे। इसके बाद वह शंघाई में एक राजनीतिक रैली में पहुंचे, जिसे देखकर लगा, मानो यह उनके एक वर्ष के कार्यकाल के पूरा होने के उत्सव के रूप में की गई थी। इसमें उन्होंने राहुल गांधी पर चुटकी भी ली।
हालांकि अभी यह देखना बाकी है कि क्या मोदी ने चीन को सही संदेश दिया। अतीत में भी चीन के साथ्ा हमारी औपचारिक कूटनीतिक वार्ताएं होती रही हैं, मगर शायद हमारा संदेश उस तक नहीं पहुंच पाया। 1950 के दशक में दोनों देशों की सीमा रेखा के बारे में कुछ कहने से हम हिचकते थे। हमें हैरत तब हुई, जब चीन ने 1959 में अचानक यह मुद्दा उठाया।
मगर इस बार मोदी ने चीन को साफ लहजे में बताया कि भारत और चीन के बीच असल दिक्कत भरोसा न करने की है, और इस बारे में कुछ किया जाना चाहिए। वर्षों से हम चीनी नेताओं को यह कहते सुनते आए हैं कि पाकिस्तान से उनके रिश्तों का भारत पर कोई असर नहीं होगा। हालांकि चीन जिस तादाद में पाकिस्तान की सैन्य मदद करता आया है, उसमें हमारे लिए संदेह की पर्याप्त्ा गुंजाइश है। 1980 के दशक के प्रारंभ से ही चीन परमाणु हथियारों और मिसाइलों के विकास में पाकिस्तान की मदद करता आया है। सामरिक हथियारों के मामले में पाकिस्तान को चीन की यह मदद आज भी जारी है।
दोनों देशों के बीच अविश्वास पैदा करने वाला दूसरा मुद्दा सीमा विवाद का है। मोदी की यात्रा के दौरान इसमें बहुत थोड़ी ही प्रगति हुई है। दोनों ही पक्ष इसे जल्द सुलझाने की बात तो करते हैं, मगर दोनों ने यह संकेत भी दिया है कि इस दिशा में कोई भी समझौता सिर्फ उनकी शर्तों पर हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ इस प्रगति को 'यथास्थिति' या 'एलएसी प्लस' नाम देते हैं। दरअसल, भारत यह चाहता है कि चीन अक्साई चिन के क्षेत्र पर से अपना दावा छोड़े। वहीं, चीन यह चाहता है कि पूर्व के क्षेत्र में भारत उसे छूट दे। हाल के समय में चीन ने इस पूर्व क्षेत्र (अरुणाचल प्रदेश) को दक्षिणी तिब्बत कहना शुरू किया है। पिछली कुछ वार्ताओं में चीन के वार्ताकारों ने भारत से आग्रह किया है कि वह तवांग क्षेत्र और वहां के सत्रहवीं सदी के प्रसिद्ध मठ पर से अपना दावा छोड़ दे। इसी के नजदीक दलाई लामा का जन्म हुआ था।
1988 से हम यह मानते आए हैं कि आपसी भरोसा कायम करने वाले उपायों के जरिये सीमा विवाद हल करनेे के बाद ही भारत और चीन के बीच रिश्ते सामान्य हो सकते हैं। इसी सोच के चलते हमने चीन के साथ तमाम समझौते किए। मसलन, 1993 में शांति और सौहार्द कायम रखने के लिए समझौता, 1996 व 2005 के समझौते, 2012 में भारत-चीन सीमा पर परामर्श और समन्वय के लिए संचालन तंत्र संबंधी समझौता और अक्तूबर, 2013 में हस्ताक्षरित सीमा सुरक्षा सहयोग समझौता (बीडीसीए)।
सितंबर, 2014 में चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान लद्दाख के चुमार में चीन की घुसपैठ से साफ होता है कि सीमा पर शांति कायम रखने के लिए दोनों देशों को काफी कुछ करना होगा। गौरतलब है कि बीडीसीए समझौते पर वार्ता की शुरुआत चीन ने ही की थी। सीमा विवाद पर एक कोड ऑफ कंडक्ट लागू करने पर भी चीन जोर दे रहा है। पिछले वर्ष जब चीनी राष्ट्रपति भारत यात्रा पर थे, तब प्रधानमंत्री मोदी ने सलाह दी थी, कि देपसांग और चुमार जैसी स्थितियां फिर से पैदा न हों, इसके लिए जरूरी है कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का पालन करें। अपनी इस यात्रा में भी प्रधानमंत्री मोदी ने यह मुद्दा उठाया। हालांकि चीन ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, क्योंकि यह मुद्दा संयुक्त बयान में शामिल नहीं था। विश्लेषकों का मानना है कि चीन एलएसी को स्वीकार नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे वह यथास्थिति से बंधने को मजबूर हो जाएगा। एशिया में भारत और चीन की संयुक्त ताकत पर हो रही बातों और दोनों देशों के बीच के रिश्ते की आर्थिक संभावनाओं से परे मोदी ने सीमा विवाद का समाधान ढूंढने पर जोर दिया। उन्होंने एलएसी को स्पष्ट करने की बात भी की। साथ ही, उन्होंने यह सुनिश्चित करने को भी कहा कि भारत और चीन के दूसरे देशों के साथ रिश्ते आपसी चिंता का विषय नहीं होने चाहिए।
अंत में, जैसा कि 1988 से होता चला आ रहा है, दोनों देशों ने दूसरे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर प्रतिबद्धता जताई। आर्थिक सहयोगी तो दोनों देश पहले से हैं, हालांकि व्यापार असंतुलन भारत की चिंता का विषय जरूर बना हुआ है। कुछ भी हो, चीन के संसाधन और भारत की जरूरतों को देखते हुए, दोनों के बीच आर्थिक सहयोग की अकूत संभावनाएं हैं। मगर, जैसा कि मोदी कहते हैं, जब तक भारत और चीन के बीच 'रणनीतिक अविश्वास' कम नहीं होता, दोनों देश इन संभावनाओं को साकार नहीं कर सकेंगे।
लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के प्रतिष्ठित फैलो हैं।