यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दिनों कितने समाचार संस्थान और प्रसारक ऐसे कोणों और नजरिए की बात करते हैं, जिसे हम व्यापक रूप में दार्शनिक परिप्रेक्ष्य कह सकते हैं। जैसा कि हम कोविड-19 महामारी का सामना कर रहे हैं, मैं उन लोगों में से हूं, जिनसे यह पूछा गया है और मैं विनम्रतापूर्वक इसमें योगदान की कोशिश करूंगा।
अभी के लिए कौन-सा दर्शन अच्छा है? मुझसे पूछने की एक खास वजह है, युद्ध की नैतिकता से संबंधित मेरी पृष्ठभूमि, वह यह कि जब हम अत्यंत चरम और जीवन को बदलकर रख देने वाले हालातों का सामना करते हैं, तब हमें कैसी नैतिकता और संस्कृति की जरूरत होती है। यह ऐसा विषय है, जिस पर मैंने मेरे शानदार सहयोगी ग्रेग रिकबर्ग और पीआरआईओ के अन्य सहयोगियों के साथ काम किया है।
सवाल यह है कि क्या इसकी तुलना वाकई युद्ध से की जा सकती है? क्या हम वैसे ही संसाधनों को खंगाल रहे हैं और उसी तरह के भय और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, जैसा कि हम तब करते हैं, जब हम युद्ध का सामना कर रहे होते हैं? यह तुलना ताकत और कमजोरियां दोनों से जुड़ी है। जो कुछ घट रहा है, उसकी नाटकीयता और हमारे लिए क्या जरूरी है, उसे देखें, तो यह निश्चित रूप से युद्ध जैसा लगता है।
1960 के दशक में पैदा हुई मेरी पीढ़ी के अनेक लोगों की तरह मैं भी अपने अभिभावकों और दोस्तों के बीच बड़ा हुआ, जिन्होंने नॉर्वे के कब्जे के दौर का खुद से अनुभव किया था। मुश्किलों, भय, एकजुटता और गहरी अनिश्चितता ने हम पर प्रभाव डाला। और मैं यह महसूस करता हूं कि यह किसी भी रूप में वैसा नहीं है, इसके बावजूद मैं खुद को वैसे ही निर्णायक हालात में पा रहा हूं।
यह समानता यहीं खत्म नहीं होती। जब स्वास्थ्य सुरक्षा की प्राथमिकताओं की बात आती है, तब असाधारण निर्णय लेने पड़ते हैं। बेशक यह नैतिक दुविधा है, जिससे अनेक स्वास्थ्य कार्यकर्ता रोजाना गुजरते हैं, लेकिन वे नाटकीय और इसके आदी हो चुके हैं। चिकित्सा जगत के मुहावरे में इसे 'ट्राइएज' (आपात स्थिति में गंभीर रोगियों को अन्य रोगियों से पहले इलाज उपलब्ध कराना) कहा जाता है।