हम यह जानते हैं कि भारत में कई भारत हैं। कोविड-19 से मुकाबले के लिए सरकार द्वारा इक्कीस दिन के लॉकडाउन की घोषणा करने के बाद एक भारत में कई भारत की सच्चाई आज सबसे स्पष्ट रूप से हमारे सामने है। एक भारत उन लोगों का है, जो लॉकडाउन के दौरान इस कारण परेशान और चिंतित हैं कि वे जो चीजें चाहते हैं, उन सबकी होम डिलीवरी नहीं हो पा रही।
एक दूसरा भारत दूरस्थ गांवों में रहने वाले उन लोगों का है, जो अपना अस्तित्व बचाने के लिए चिंतित हैं, और जो बड़े शहरों की निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी का काम या सड़क किनारे की चाय की दुकान में सहायक का काम पाने की तलाश में अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहर आए हैं।
इस तरह के असंख्य लोग अब मुसीबत में फंस गए हैं-नौकरी छूट जाने के कारण उन्हें शहर छोड़ना पड़ा, लेकिन घर तक पहुंचने में उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी। उनमें से काफी तो वाहनों के अभाव में पैदल ही घर के लिए निकल पड़े थे। जबकि शहरों से निकले अनेक लोग चौदह दिनों तक अलग-थलग रहने के बाद ही घर पहुंच पाएंगे।
सामान्य स्थितियों में ये दो भारत समानांतर पटरियों पर चलते हैं। वे कभी नहीं मिलते। लेकिन इस समय हम टेलीविजन या इंटरनेट पर गांव लौटते लोगों के समूहों को देखने या इस पर चिंतित होने से खुद को नहीं रोक सकते। वैश्वीकरण के दौर में देश-दुनिया चूंकि एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, ऐसे में, कुछ लोगों में अगर संक्रमण का खतरा है, तो यह खतरा हम सब में भी उतना ही है।
इसलिए फिलहाल हमें इस पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि संक्रमण का सबसे अधिक खतरा किस पर है, और हमें क्या करना चाहिए। हमें कठोर वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए। संक्रमण का सर्वाधिक खतरा ग्रामीण इलाकों में है, जहां देश की सबसे बड़ी आबादी रहती है।
दो ही दिन पहले ही दिल्ली और दूसरे शहरों से हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को भूखे-प्यासे, पैदल ही अपने गांवों के लिए निकल पड़ने को हमने देखा है। इसके ब्योरे तो आए कि परिवहन का साधन न होने के कारण उनके लिए बसों की व्यवस्था की गई, लेकिन इसकी जानकारी नहीं है कि वे अपने गांव तक कैसे पहुंचे या रास्ते में किस स्थिति में हैं।
घर लौटने की इस अफरा तफरी में कई मौतें भी हुईं। उन लोगों में से जिनमें भी कोरोना के लक्षण पाए जाते हैं, उन्हें तत्काल अलग-थलग करने की जरूरत है, ताकि ग्रामीण आबादी में संक्रमण न फैल पाए। इसके अलावा उनकी सामाजिक सुरक्षा की भी आवश्यकता है, ताकि यह स्वास्थ्य संकट भीषण मानवीय संकट में तब्दील न हो।