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गांव सजग हों तो आसान होगी जंग

पत्रलेखा चटर्जी
Updated Tue, 31 Mar 2020 04:08 AM IST
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खेत में काम करता एक किसान - फोटो : PTI

हम यह जानते हैं कि भारत में कई भारत हैं। कोविड-19 से मुकाबले के लिए सरकार द्वारा इक्कीस दिन के लॉकडाउन की घोषणा करने के बाद एक भारत में कई भारत की सच्चाई आज सबसे स्पष्ट रूप से हमारे सामने है। एक भारत उन लोगों का है, जो लॉकडाउन के दौरान इस कारण परेशान और चिंतित हैं कि वे जो चीजें चाहते हैं, उन सबकी होम डिलीवरी नहीं हो पा रही।

एक दूसरा भारत दूरस्थ गांवों में रहने वाले उन लोगों का है, जो अपना अस्तित्व बचाने के लिए चिंतित हैं, और जो बड़े शहरों की निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी का काम या सड़क किनारे की चाय की दुकान में सहायक का काम पाने की तलाश में अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहर आए हैं।



इस तरह के असंख्य लोग अब मुसीबत में फंस गए हैं-नौकरी छूट जाने के कारण उन्हें शहर छोड़ना पड़ा, लेकिन घर तक पहुंचने में उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी। उनमें से काफी तो वाहनों के अभाव में पैदल ही घर के लिए निकल पड़े थे। जबकि शहरों से निकले अनेक लोग चौदह दिनों तक अलग-थलग रहने के बाद ही घर पहुंच पाएंगे।

सामान्य स्थितियों में ये दो भारत समानांतर पटरियों पर चलते हैं। वे कभी नहीं मिलते। लेकिन इस समय हम टेलीविजन या इंटरनेट पर गांव लौटते लोगों के समूहों को देखने या इस पर चिंतित होने से खुद को नहीं रोक सकते। वैश्वीकरण के दौर में देश-दुनिया चूंकि एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, ऐसे में, कुछ लोगों में अगर संक्रमण का खतरा है, तो यह खतरा हम सब में भी उतना ही है।

इसलिए फिलहाल हमें इस पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि संक्रमण का सबसे अधिक खतरा किस पर है, और हमें क्या करना चाहिए। हमें कठोर वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए। संक्रमण का सर्वाधिक खतरा ग्रामीण इलाकों में है, जहां देश की सबसे बड़ी आबादी रहती है।

दो ही दिन पहले ही दिल्ली और दूसरे शहरों से हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को भूखे-प्यासे, पैदल ही अपने गांवों के लिए निकल पड़ने को हमने देखा है। इसके ब्योरे तो आए कि परिवहन का साधन न होने के कारण उनके लिए बसों की व्यवस्था की गई, लेकिन इसकी जानकारी नहीं है कि वे अपने गांव तक कैसे पहुंचे या रास्ते में किस स्थिति में हैं।
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घर लौटने की इस अफरा तफरी में कई मौतें भी हुईं। उन लोगों में से जिनमें भी कोरोना के लक्षण पाए जाते हैं, उन्हें तत्काल अलग-थलग करने की जरूरत है, ताकि ग्रामीण आबादी में संक्रमण न फैल पाए। इसके अलावा उनकी सामाजिक सुरक्षा की भी आवश्यकता है, ताकि यह स्वास्थ्य संकट भीषण मानवीय संकट में तब्दील न हो।

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खेत में काम करता एक किसान - फोटो : PTI
हम यह जानते हैं कि भारत में कई भारत हैं। कोविड-19 से मुकाबले के लिए सरकार द्वारा इक्कीस दिन के लॉकडाउन की घोषणा करने के बाद एक भारत में कई भारत की सच्चाई आज सबसे स्पष्ट रूप से हमारे सामने है। एक भारत उन लोगों का है, जो लॉकडाउन के दौरान इस कारण परेशान और चिंतित हैं कि वे जो चीजें चाहते हैं, उन सबकी होम डिलीवरी नहीं हो पा रही।

एक दूसरा भारत दूरस्थ गांवों में रहने वाले उन लोगों का है, जो अपना अस्तित्व बचाने के लिए चिंतित हैं, और जो बड़े शहरों की निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी का काम या सड़क किनारे की चाय की दुकान में सहायक का काम पाने की तलाश में अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहर आए हैं।

इस तरह के असंख्य लोग अब मुसीबत में फंस गए हैं-नौकरी छूट जाने के कारण उन्हें शहर छोड़ना पड़ा, लेकिन घर तक पहुंचने में उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी। उनमें से काफी तो वाहनों के अभाव में पैदल ही घर के लिए निकल पड़े थे। जबकि शहरों से निकले अनेक लोग चौदह दिनों तक अलग-थलग रहने के बाद ही घर पहुंच पाएंगे।

सामान्य स्थितियों में ये दो भारत समानांतर पटरियों पर चलते हैं। वे कभी नहीं मिलते। लेकिन इस समय हम टेलीविजन या इंटरनेट पर गांव लौटते लोगों के समूहों को देखने या इस पर चिंतित होने से खुद को नहीं रोक सकते। वैश्वीकरण के दौर में देश-दुनिया चूंकि एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, ऐसे में, कुछ लोगों में अगर संक्रमण का खतरा है, तो यह खतरा हम सब में भी उतना ही है।

इसलिए फिलहाल हमें इस पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि संक्रमण का सबसे अधिक खतरा किस पर है, और हमें क्या करना चाहिए। हमें कठोर वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए। संक्रमण का सर्वाधिक खतरा ग्रामीण इलाकों में है, जहां देश की सबसे बड़ी आबादी रहती है।

दो ही दिन पहले ही दिल्ली और दूसरे शहरों से हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूरों को भूखे-प्यासे, पैदल ही अपने गांवों के लिए निकल पड़ने को हमने देखा है। इसके ब्योरे तो आए कि परिवहन का साधन न होने के कारण उनके लिए बसों की व्यवस्था की गई, लेकिन इसकी जानकारी नहीं है कि वे अपने गांव तक कैसे पहुंचे या रास्ते में किस स्थिति में हैं।

घर लौटने की इस अफरा तफरी में कई मौतें भी हुईं। उन लोगों में से जिनमें भी कोरोना के लक्षण पाए जाते हैं, उन्हें तत्काल अलग-थलग करने की जरूरत है, ताकि ग्रामीण आबादी में संक्रमण न फैल पाए। इसके अलावा उनकी सामाजिक सुरक्षा की भी आवश्यकता है, ताकि यह स्वास्थ्य संकट भीषण मानवीय संकट में तब्दील न हो।

लॉकडाउन का आर्थिक असर भीषण होने वाला है

इस लॉकडाउन का आर्थिक असर भीषण होने वाला है। इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू के लिए दक्षिण एशिया में ग्रामीण आजीविका और सामुदायिक संस्थान के क्षेत्र में काम करने वाले शौभिक मित्र की हालिया रिपोर्ट ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त कुछ खास खतरों के प्रति हमारा ध्यान आकर्षित करती है।

ये खतरे हैं-शिक्षा का स्तर कम होने के कारण जागरूकता की कमी, अनेक जगहों पर साफ पानी का अभाव, कुपोषण, और नाकाफी तथा स्तरहीन सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं। शहरी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में आई सुस्ती का असर ग्रामीण इलाकों में भी पड़ने लगा है।

अनेक जमीनी अध्ययन और अनुभव बताते हैं, और जैसा कि शौभिक मित्र ने भी बताया है कि ग्रामीण परिवारों की आय का  बड़ा हिस्सा प्रवासी कामगारों तथा दैनिक मजदूरों के जरिये आता है। ग्रामीण आबादी पर कोविड-19 और उसके कारण किए गए लॉकडाउन का असर दिखने लगा है।

इसकी रिपोर्ट है कि झारखंड के पॉल्ट्री उत्पादक ब्रॉयलर चिकन के दाम घटने का खामियाजा भुगत रहे हैं, जो 90 रुपये प्रति किलो से घटकर अब बीस रुपये रह गया है। मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में मंडियां तथा ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में ग्रामीण हाट बंद हो गए हैं, नतीजतन उन राज्यों में छोटे किसानों के लिए अपने उत्पाद बेचना कठिन हो गया है।

सामने आ रहीं कुछ प्रेरणादायक कहानियां

हालांकि संकट के इस समय में कुछ प्रेरणादायक कहानियां भी सामने आ रही हैं। उदाहरण के लिए, ओडिशा में अनेक स्वयं सहायता समूह मास्क बना रहे हैं, तो स्थानीय आशा कार्यकर्ताएं विभिन्न समुदायों के सदस्यों को कोरोना से संबंधित उपयोगी जानकारियां दे रहे हैं।

ऐसे समय में मिड डे मील और आंगनबाड़ी मील की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए, तथा इनका वितरण घरों में किया जाना चाहिए, जैसा कि केरल सरकार कर रही है, ताकि बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कम से कम एक वक्त पौष्टिक भोजन मिले। भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या लाखों में है।

पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों में, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता संक्रमण या चिकित्सा संबंधी जटिलताओं के कारण कम रह गई है, कोविड-19 के संक्रमण का खतरा ज्यादा है। कोरोना से लोगों को बचाने के लिए न केवल जांच की क्षमता और चिकित्सा सुविधा का दायरा बढ़ाना होगा, बल्कि सुरक्षा उपाय भी तेजी से लागू करने होंगे।

इसका भी पूरा ध्यान रखना होगा कि कोरोना के खिलाफ अग्रिम मोर्चे पर लड़ रहे हमारे डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी खुद को संक्रमण से बचाने के तमाम सुरक्षा उपकरणों से लैस हों। इसके बगैर हम उन्हें खो देंगे और संक्रमण के फैलने का खतरा और बढ़ जाएगा।

जब हम आग बुझाने वाले दमकलकर्मियों को पूरी तरह तैयार करके भेजते हैं, तब कोरोना संकट के इस दौर में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के बचाव और सुरक्षा की पूरी व्यवस्था होनी ही चाहिए।

मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे

देश में कोरोना से संक्रमित लोगों का आंकड़ा बहुत तेजी से 1,000 के पार हो गया है और मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है, जो डायबिटीज, हाइपर टेंशन आदि के मरीज हैं। पहले से बीमार लोगों को कोरोना का प्रकोप तनावग्रस्त कर रहा है।

लॉकडाउन के कारण वे अपनी बीमारी के इलाज के लिए भी अस्पताल नहीं जा पा रहे हैं। कोरोना के मौजूदा संकट से निपटने की पर्याप्त जानकारी हमारे पास नहीं है, न ही हमारे पास पूरी तैयारी है। ग्रामीण आबादी को इससे लड़ने के लिए तैयार करना कोरोना से जंग में हमारे लिए बहुत मददगार होगा।
 
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