अब प्रश्न यह है कि न्याय की मंशा क्या हो? इस बारे में ऐसा कहना समीचीन होगा कि हालांकि न्याय सदैव निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन अगर यह विलंबित हो, तो जमीनी स्तर पर अर्थहीन हो जाएगा। न्याय में विलंब का एक बड़ा और अत्यंत महत्वपूर्ण कारण अदालतों में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ है।
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, बीते जुलाई तक देश भर के विभिन्न न्यायालयों में पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित थे। इनमें से 85 प्रतिशत से अधिक मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित थे। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के अनुसार, 14 जुलाई तक उच्च न्यायालयों में 60.62 लाख मामले लंबित थे और अधीनस्थ न्यायालयों में 4.41 करोड़ मामले लंबित थे। इंटीग्रेटेड केस मैनेजमेंट सिस्टम से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, एक जुलाई तक उच्चतम न्यायालय में 69,766 मामले लंबित थे।
हालांकि हाल ही में भारत के प्रधान न्यायमूर्ति ने मामलों के निपटारे के प्रति उच्चतम न्यायालय के दायित्व का हवाला देते हुए यह कहा है कि गत वर्ष देश के सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग 50 हजार मामलों का निपटारा किया और लगभग इतने ही मामले दर्ज किए गए। यानी गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या में इज़ाफा नहीं हुआ। प्रधान न्यायमूर्ति ने यह भी कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय में एक समय में एक से अधिक सांविधानिक पीठ बनाई गई, ताकि बड़ी संख्या में लंबित सांविधानिक मामलों का निपटारा किया जा सके।
उच्चतम न्यायालय ने 1979 में ही हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य मामले में त्वरित सुनवाई के अधिकार को मान्यता देते हुए उसे संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार में शामिल किया था। न्यायालय ने कहा था कि त्वरित सुनवाई आपराधिक न्याय तंत्र का मूल तत्व है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि सुनवाई में देरी अपने आप में किसी व्यक्ति को न्याय से वंचित करना है। विश्व में सबसे पहले 1215 में मैग्ना कार्टा की धारा 40 में यह उल्लेख किया गया था कि 'हम किसी को न्याय के अधिकार से वंचित या विलंबित नहीं करेंगे।' चूंकि मैग्ना कार्टा मानवाधिकारों का पहला वैश्विक चार्टर है, अतः न्याय उपलब्धता में विलंब से मानवाधिकारों का भी उल्लंघन होता है।
इसी प्रकार, अमेरिकी संविधान के छठे संशोधन, 1791 में भी त्वरित सुनवाई का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि सभी आपराधिक मामलों में राज्य और जिले कि निष्पक्ष जूरी द्वारा अभियुक्त के त्वरित सुनवाई के अधिकार का संरक्षण किया जाएगा। कुल मिलाकर, यह कहना उचित है त्वरित न्याय या सुनवाई का सीधा संबंध लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों की गरिमा से है।
अब यदि न्यायाधीशों की संख्या पर गौर करें, तो केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री ने यह जानकारी दी है कि लंबित मामलों की संख्या कम करने और सुनवाई में तेजी लाने के लिए न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या बढ़ा दी गई है। पिछले नौ वर्षों में उच्चतम न्यायालय में 56 न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई। इसी प्रकार, उच्च न्यायालयों में 919 नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई और 653 अतिरिक्त न्यायाधीशों को स्थायी किया गया। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 2014 में 909 थी, जिसे बढ़ाकर अब 1,114 कर दिया गया है। दूसरी ओर, जिला और अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 2014 में 19,518 थी, जिसे अब बढ़ाकर 25,246 कर दिया गया है।
जहां तक न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात की बात है, तो भारत में प्रति दस लाख की जनसंख्या पर 21 न्यायाधीश हैं। भारत के विधि आयोग ने यह सिफारिश की है कि यह अनुपात प्रति दस लाख की जनसंख्या पर 50 जज होना चाहिए। निम्न अनुपात के कारण स्वाभाविक रूप से न्यायाधीशों पर कार्य का बोझ बढ़ता है, जिससे न केवल न्यायिक कार्यकुशलता प्रभावित होती है, बल्कि त्वरित सुनवाई का अधिकार भी बाधित होता है।
सरकार द्वारा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से निश्चित रूप से न्यायिक कार्यकुशलता बढ़ेगी और न्याय की त्वरित उपलब्धता में भी सहायता मिलेगी। गौरतलब है कि अधिकांश मामलों में सरकार ही वादी है, जिसका सबसे बड़ा कारण सरकारी क्षेत्र में कार्य संस्कृति का कार्यकुशल नहीं होना और मंत्रालयों तथा विभागों में शिकायत निवारण तंत्र का सुदृढ़ नहीं होना है। इसका नकारात्मक प्रभाव आम लोगों तक न्याय की उपलब्धता पर पड़ता है। इसमें तत्काल सुधार जरूरी है।
मामलों की त्वरित सुनवाई की दृष्टि से सरकार द्वारा उठाए गए दो कदम अत्यंत सराहनीय हैं। पहला, फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना, और दूसरा, ई-कोर्ट के तीसरे चरण के लिए चालू वित्त वर्ष में 7,000 करोड़ रुपये का आवंटन। उल्लेखनीय है कि देश भर में 758 फास्ट ट्रैक कोर्ट कार्यरत हैं, जिनमें पॉक्सो कानून के तहत मामलों के निपटारे के लिए 411 ऐसी अदालतें शामिल हैं। इसी प्रकार, ई-कोर्ट परियोजना के तहत निचले स्तर तक न्याय उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश जारी है।
गौरतलब है कि नए बदलते परिवेश में नए कानूनों की आवश्यकताएं बढ़ गई हैं। इन परिस्थितियों में नए अथवा संशोधित कानूनों के तहत बहुत बड़ी संख्या में नए विवादित मामले आ गए हैं, जिनके कारण लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि की समस्या और गंभीर हो गई है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि कई अवसरों पर प्रक्रियात्मक कानून भी मामलों के निपटान में देरी की गुंजाइश पैदा करते हैं। कभी-कभी न्यायपालिका को कानून में प्रयुक्त शब्द के वास्तविक अर्थ की व्याख्या में समय लगता है। इसलिए प्रक्रियात्मक कानूनों को सरल बनाने की आवश्यकता है। समग्र रूप से सभी मुद्दों पर ध्यान देना आवश्यक है, तभी अन्याय दूर कर अर्थपूर्ण न्याय दिया जा सकता है।
(-लेखक दिल्ली स्थित सेंटर फॉर अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेंस के अध्यक्ष हैं)