फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पांच सौ की पार्कर

Sat, 14 Mar 2015 09:19 PM IST
अभिनव अरुण
विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन





छोडो भी ये पांच सौ की पार्कर देना
इस कलम से क्या लिखूं
दफ्तर की फाइलें
या घर का हिसाब
क्योंकि अब नहीं लिखनी मुझे
कविताओं की किताब
देना ही हो, तो मुझे मेरे जन्मदिन
पर दिया करो
ये वरदान कि मैं अगले जन्म में कवि न बनूं
मुझे छंद लय मात्रा का न हो ज्ञान
मैं भी साहब बन, कर सकूं देश की सेवा
जैसे आज बहुतेरे कर रहे हैं
एक कवि के सिवाय।

------------------
डायरी

मैं क्या करूंगा एक और डायरी
पहले से ही कई पड़ी हैं कोरी
अलमारी में डायरी रखूं या गृहस्थी का सामान
जब देना था, तब तो तुमने नहीं दी
अब डायरी नहीं लिखता और न ही
लिखता हूं कविताएं
जिन्हें पढूं पढाऊं, सहेजकर रखूं
प्रकाशित हो इतराऊं
अब मैं डरता हूं डायरी से , शायरी से।
------------------
प्रेम

कविता में प्रेम नहीं होता
प्रेम में होती हैं कविताएं
जून के हिस्से में होती है जुलाई
दिसंबर को मिलता है जनवरी का साथ
और अगस्त बेचारा रह जाता है अकेला
सावन में भीगा
सबसे ऊंची पहाड़ी पर
लिए हाथ में बादलों में लिपटे
हुए सूरज का तोहफा
जिसे लेने अगले सावन तक भी
शायद कोई नहीं आएगा
और इस तरह अगस्त बन जाएगा
प्रतीक्षारत कवि
पथराई आंखों वाला
जिसका न कोई संग्रह आएगा
और न जिसकी कविताओं की आप करेंगे चर्चा अगली 14 फरवरी तक।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें