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मुद्दा : फलस्तीन का अतीत और वर्तमान, इस क्रूरतम संघर्ष के लिए अमेरिका, इंग्लैंड के साथ जर्मनी जिम्मेदार

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 28 Jan 2024 07:53 AM IST

सार

1990 के दशक में लिखा गया लिंडा ग्रांट का उपन्यास वर्तमान इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष के बारे में बताता है कि यह अमेरिका, इंग्लैंड व जर्मनी की जिम्मेदारी है कि वे उसका समाधान ढूंढें, जिसे यहां तक पहुंचाने के जिम्मेदार भी वे खुद हैं।
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Israel-Palestine Conflict - फोटो : ANI


इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र बीस साल की एक यहूदी युवती इवलिन सर्ट है, जो ब्रिटेन में पली-बढ़ी, लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के तुरंत बाद वह यह देखने के लिए फलस्तीन चली गई कि वहां बनने जा रहे नए यहूदी राष्ट्र के लिए वह क्या कर सकती है। वह रास्ते में एक किबुत्ज में ठहरती है, जिसका मालिक समाजवादी विचारों वाला एक रूसी यहूदी है और जिसका आसपास के क्षेत्रों में बड़ा भारी प्रभाव है। किबुत्ज के इस कट्टरवादी नेता का उन स्थानीय फलस्तीनियों के प्रति रवैया अच्छा नहीं था, जो उसके आने के बहुत पहले से यहां रह रहे थे। वह इवलिन से कह रहे थे,  'अगर अंग्रेज चले गए, और हमारा उदार शासन शुरू हुआ, तो हमारे कुछ विचार उन्हें बदल देंगे। निश्चित रूप से इस विशाल रेगिस्तान में हमारे आसपास उन्हें कोई अच्छी जगह मिल जाएगी।...हम उन्हें उनकी जमीन के पैसे देंगे। हम उनके साथ धोखा नहीं करेंगे ... हम भविष्य में विश्वास करते हैं।'


इसे पढ़ते हुए मुझे यहूदी विचारक मार्टिन बुबेर की याद आई, जिन्होंने वर्ष 1938 में महात्मा गांधी को लिखी अपनी चिट्ठी में लगभग इसी से मिलती-जुलती बातें कही थीं। हालांकि कट्टर यहूदियों के विपरीत बुबेर अरबों और यहुदियों में मेल-जोल में यकीन रखते थे, लेकिन उनका भी मानना था कि यहूदी अरबों को शिक्षित करने का काम करेंगे। खेती करने के अरबों के प्राचीन तरीकों को देखते हुए बुबेर का दावा था कि अरबों को और उनके तौर-तरीकों को बदलने के लिए यहूदी जरूरी हैं। जैसा कि उनका कहना था, यहां की मिट्टी से पूछें कि 1,300 साल तक उसके लिए अरबों ने क्या किया, और हमने मात्र पचास साल में क्या कर डाला!


मार्टिन बुबेर फलस्तीन के अरबों को कमतर नस्ल के रूप में देखते थे। गांधी जी को लिखी चिट्ठी में उन्होंने कहा था,  'यहां की मिट्टी हमें पहचानती है।...यहूदी किसानों ने अपने फलस्तीनी किसानों को सिखाना शुरू किया है कि खेती कैसे करते हैं। हम आगे भी इन फलस्तीनियों को सिखाने की इच्छा रखते हैं।'


इवलिन किब्तुज के ग्रामीण जीवन से ऊबकर आधुनिक शहर तेल अबीव में पहुंचती है। वहां यहूदियों की आबादी में वह एक अपार्टमेंट किराये पर लेती है और एक अत्याधुनिक महिला श्रीमती लिंज से दोस्ती गांठती है, जो बर्लिन की है। शहर में एक अतिवादी युवा यहूदी से उसकी निकटता बढ़ती है, जो एक सशस्त्र अतिवादी समूह इर्गुन का सदस्य है। इर्गुन के लोग किंग डेविड होटल पर बमबारी करते हैं, जिसमें ब्रिटिशों के साथ कुछ यहूदी भी मारे जाते हैं। उपन्यास के अंत में 70  साल की इवलिन द्वारा अपने जीवन का सिंहावलोकन होता है।


फलस्तीन में एक साल बिताने के बाद इवलिन ब्रिटेन चली जाती है, जहां वह एक यहूदी संगीतकार से शादी करती है। दशकों बाद पति की मृत्यु के बाद वह तेल अबीव लौटती है,  जहां वह जीवन के बाकी वक्त बिताने का फैसला करती है। उसकी पुरानी पड़ोसन श्रीमती लिंज जब वह फलस्तीनियों पर इस्राइल व उसकी सेना के वर्चस्ववादी रवैये के बारे में बताती हैं, तो इवलिन को बहुत बुरा लगता है कि आखिर एक यहूदी ऐसा कैसे कर सकता है।


1990 के दशक में जब यह उपन्यास लिखा गया, तब ओस्लो समझौते की विफलता स्पष्ट हो चुकी थी और इसने लिंडा ग्रांट को 1940 के दशक में संघर्ष की उत्पत्ति का एक काल्पनिक वर्णन करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन आज जबकि इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष अपने क्रूरतम मोड़ पर पहुंच चुका है, यह उपन्यास पढ़ना काफी मार्मिक और गंभीर अनुभव था। उपन्यास यहूदियों की अद्वितीय पीड़ा, यूरोप में बड़े पैमाने पर यहूदी-विरोधी भावना, हिटलर द्वारा अंजाम दिए गए नरसंहार और इस्राइल के निर्माण के बाद भी पश्चिम एशिया के देशों में यहूदियों के उत्पीड़न की याद दिलाता है। उपन्यास खत्म करने के बाद मैंने इंग्लैंड के साहित्य में लिंडा का स्थान खोजने के लिए गूगल पर उनका नाम खोजा। मुझे पिछले नवंबर को प्रकाशित उनका एक लेख मिला, जिसमें वह इंग्लैंड के लेखकों और अभिनेताओं को लेकर शिकायत करती हैं, जो आम फलस्तीनियों का समर्थन करते हुए इस्राइली नागरिकों की हत्या पर कुछ ठोस बोलने से बचते रहे। वह कहती हैं, ‘इंग्लैंड के यहूदियों के पास ऐसी कोई राजनीतिक रणनीति नहीं है, जो इस्राइल के अति कट्टर दक्षिणपंथ और हमास के अस्तित्व के बीच के विरोधाभाष को दूर कर सके।’
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मेरे ख्याल से अगर इस संघर्ष का कोई समाधान है, तो इसका नेतृत्व यहूदी या अरब को नहीं, बल्कि उन देशों को करना चाहिए, जो सबसे पहले इन देशों के बीच समस्या का कारण बनें। ग्रांट के उपन्यास में एक ब्रिटिश अधिकारी कहता है, ‘अरबों में हमेशा से नेतृत्व और संगठन की कमी रही है और यहूदियों ने इसका पूरा फायदा उठाया है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि जमीन उन्हीं की है, जिस पर यहूदियों ने हस्तक्षेप किया है। ऐसे में, यहां पर यूरोपीय मौजूदगी फलस्तीनियों के राष्ट्रीय हित में हो सकती है।’


उल्लेखनीय है कि 1917 की बालफोर घोषणा के जरिये यहूदियों के लिए फलस्तीन में एक देश बनाने का वादा करते हुए अंग्रेजों ने इस्राइल के गठन की प्रेरणा दी। यहूदियों के उत्पीड़न और फिर नरसंहार जर्मनी ने कहानी को आगे बढ़ाया। एक बार इस्राइल के बन जाने पर, खासकर 1967 के बाद फलस्तीनियों के अधिकारों के लगातार उल्लंघन को अमेरिका ने प्रोत्साहित किया। उसने इस्राइल को पैसा दिया और उसके विस्तार की योजनाओं पर आंख मूंद लीं। जाहिर है कि यहूदी या अरब से ज्यादा, वे इंग्लैंड, जर्मनी और खासकर अमेरिका हैं, जो इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष के लिए जिम्मेदार हैं।

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