भारत और पाकिस्तान के युद्ध के कगार से पीछे हटते ही दोनों मुल्कों के उच्चायुक्त अपने-अपने काम में लग गए और करतारपुर कॉरिडोर पर वार्ता के लिए योजनाएं बनाई जाने लगीं। इससे यह लगने लगा है कि इस उपमहाद्वीप में हालात सामान्य हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पिछले हफ्ते पाकिस्तान में महिलाओं ने ‘औरत मार्च’ निकाला, जिसकी अब भी चर्चा हो रही है। हमने वर्षों से देखा है कि भारतीय महिलाएं कितनी मुखर और गतिशील हैं और उन्होंने विशेष रूप से बलात्कार के खिलाफ अंतहीन विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया है, क्योंकि बलात्कार की घटनाएं भारत में बढ़ गई हैं।
हालांकि पाकिस्तान की महिलाएं भी यौन उत्पीड़न के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करती हैं, लेकिन अब भी वे समलैंगिक अधिकारों के लिए आगे नहीं आई हैं, जिसके लिए हाल में भारत में पुरुषों और महिलाओं को आंदोलन करते देखा गया। पाकिस्तान न केवल एक संकीर्ण समाज है, बल्कि समलैंगिकता इस्लाम में भी प्रतिबंधित है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सांसद कृष्णा कुमारी कोहली को सम्मान देते हुए सीनेट के अध्यक्ष ने उन्हें अपनी सीट पर बैठाकर उस दिन के सत्र का संचालन करने के लिए कहा। कृष्णा कुमारी कोहली पहली हिंदू दलित और दूसरी हिंदू महिला हैं, जिन्हें यह सम्मान दिया गया। वह महिला अधिकारों और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अपने अभियानों के लिए जानी जाती हैं।
इससे ठीक पहले पंजाब मंत्रिमंडल के सूचना मंत्री फैय्याजुल चौहान को प्रधानमंत्री इमरान खान ने हिंदुओं के खिलाफ टिप्पणी करने के कारण पद से हटा दिया। पूरे पाकिस्तान ने एकजुट होकर उन्हें हटाने की मांग की और यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के सदस्यों, जैसे मानवाधिकार मंत्री ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री से मांग की कि उन्हें हटा दिया जाना चाहिए। पाकिस्तान में यह एक स्वस्थ नया बदलाव है, जहां धीरे-धीरे, लेकिन निश्चित रूप से अल्पसंख्यकों के प्रति सहिष्णुता दिखाई जा रही है।
इस बीच कराची, लाहौर, क्वेटा, इस्लामाबाद, मुल्तान, हैदराबाद, लरकाना और पाकिस्तान के अन्य नगरों में हजारों महिलाओं ने 'हम औरतें' बैनर के तले इकट्ठा होकर पितृसत्ता के खिलाफ नारे लगाए और मुल्क में महिलाओं द्वारा झेली जाने वाली यातनाओं और सामाजिक विकास व अन्य क्षेत्रों में उनके योगदान पर बातें कीं। यह देखना दिलचस्प था कि इस वर्ष ट्रांसजेंडर भी ‘औरत मार्च’ में शामिल होने आए थे। सरकार धीरे-धीरे समाज में इन ट्रांसजेंडरों को शामिल कर रही है और उन्हें विशेषाधिकार दिए जा रहे हैं।
‘औरत मार्च’ का उद्देश्य पूरे पाकिस्तान की महिलाओं के साथ एकजुटता जताना और कार्यस्थल पर, घर में, सार्वजनिक स्थानों के साथ-साथ सुरक्षा बलों के हाथों हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ जवाबदेही और सशक्त न्याय के लिए दबाव बनाना था। ‘औरत मार्च’ में हिस्सा लेने वाली महिलाओं ने श्रम अधिकारों को लागू करने के साथ आर्थिक न्याय की मांग की और अन्य चिंताओं को भी उठाया, जैसे स्वच्छ पेयजल, हवा, वन्यजीवों और अन्य जानवरों की सुरक्षा, खाद्य और नकदी फसलों के उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी को मान्यता, निष्पक्ष न्याय प्रणाली तक पहुंच, प्रजनन न्याय, सार्वजनिक स्थलों पर पहुंच, शैक्षणिक संस्थानों में समावेशन, धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकार, युद्ध विरोधी एजेंडे को बढ़ावा और पुलिस बर्बरता और जबरन गायब करने की घटनाओं का अंत।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सांसद शेरी रहमान ने ‘औरत मार्च’ को संबोधित करते हुए महिलाओं के कई मुद्दों की तरफ ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा, 'मैं इसलिए इस मार्च में शामिल हुई हूं, क्योंकि महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन और अवसर नहीं मिलते, क्योंकि महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए मुझे अश्लील चुटकुलों पर चुप रहने के लिए कहा जाता है। मैं अपनी उन अभागी बहनों के लिए इस मार्च में शामिल हुई हूं, जो रोज अपमान झेलती हैं।'
यहां तक कि सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा तक ने पाकिस्तानी महिलाओं को संदेश भेजने और उन्हें शुक्रिया कहने के लिए समय निकाला। उन्होंने वर्दी में काम करने वाली, घर पर रहने वाली महिलाओं और विशेष रूप से शहीदों की विधवाओं के योगदान का जिक्र किया। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि पाकिस्तान की प्रगति में इस मुल्क की महान महिलाओं की भूमिका और जवाबदेही है।
जैसी कि अपेक्षा थी, कुछ पुरुषों द्वारा इस पर काफी तीखी प्रतिक्रिया जताई गई, जो मानते हैं कि ये महिलाएं वैसे अधिकार मांग रही हैं, जो संस्कृति के खिलाफ है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इस संस्कृति ने ही उन्हें आवाज उठाने वाली महिलाओं की ऑनर किलिंग की इजाजत दी है। वे यह भूल जाते हैं कि कोई भी मजहब और संस्कृति ऑनर किलिंग की इजाजत नहीं देती। फिर हमारे यहां खासकर पख्तूनों में एक क्रूर संस्कृति भी है, जिसमें विवाह में महिलाओं की अदला-बदली होती है। अगर कोई स्त्री किसी पुरुष से शादी करती है, तो उसकी बहन को उसके भाई से शादी करनी होती है और उसकी बहन से उसकी राय भी नहीं पूछी जाती। पाकिस्तान ने दुनिया की पहली मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को देखा है, लेकिन राजनीति में आने के लिए आम पाकिस्तानी महिलाओं के सामने अब भी कई चुनौतियां हैं।
पाकिस्तानी महिलाओं के सामने एक अन्य मुद्दा यह है कि शहरी केंद्रों में कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी बहुत कम है, इस प्रकार वे कई आर्थिक स्वतंत्रता से वंचित रहती हैं। विश्व बैंक के आंकड़े के अनुसार पाकिस्तान में महिला कार्यबल की भागीदारी मात्र 24 फीसदी है।
इस वर्ष ‘औरत मार्च’ में कई ऐसी महिलाएं भी शामिल थीं, जो अब बूढ़ी हो चुकी हैं, पर उन्होंने बीती सदी के अस्सी के दशक में पाकिस्तान में नारीवादी आंदोलन को आगे बढ़ाया था, जब उन्होंने सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक के खिलाफ प्रदर्शन किया था, जिनका महिलाओं के खिलाफ बहुत क्रूर कानून था। लेकिन तमाम प्रगति के बावजूद आज भी इसे एक सहकारी आंदोलन में बदलने के लिए काफी कुछ किए जाने की जरूरत है, जो वास्तव में पाकिस्तान में सामाजिक व राजनीतिक बदलाव को बढ़ावा दे सके।