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चुनाव के लिए किसानों का एजेंडा

वी एम सिंह
Updated Thu, 14 Mar 2019 06:40 PM IST
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वी एम सिंह

यह चुनाव का समय है। ऐसे में हमें अगले पांच वर्ष का राष्ट्रीय एजेंडा स्पष्ट करने की जरूरत है। हम सब खुद को कृषि पर निर्भर समाज कहते हैं, और खेती पर देश की 130 करोड़ जनता का भोजन निर्भर है। मगर नई पीढ़ी की खेती में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि यह आकर्षण खो रही है। किसानों को अपने बच्चों को पढ़ाने तक के लिए कर्ज लेना पड़ता है। नौकरियां न होने से उनके बच्चे गहरी हताशा में हैं। हम सबको मिलकर ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त हताशा को दूर करने पर विचार करना चाहिए। हम सबको मिलकर इसके लिए राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए। मैंने विभिन्न दलों के नेताओं से मिलकर पांच प्रस्ताव सुझाएं हैं, ताकि कृषि क्षेत्र को संकट से उबारा जा सके, लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ वोट में है। ये पांच प्रस्ताव हैं-



पूर्ण कर्जमाफी ः शहरी मतदाता सोचते हैं कि कर्जमाफी करदाताओं के धन की बर्बादी है और कर्ज माफी से किसान बेपरवाह हो जाएंगे और सरकारों से कर्जमाफी की उम्मीद करेंगे। हकीकत यह है कि किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम नहीं मिलता। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य कम रखती है, ताकि लोगों को सस्ते में अनाज मिल सके, जबकि खेती की लागत बढ़ती जा रही है। सरकारी एजेंसियां बहुत कम खरीद करती हैं और किसानों को खुले में सस्ते में फसल बेचनी पड़ती है। इन्हीं वजहों से किसान कर्ज में डूबते हैं और खुदकुशी करने को मजबूर होते हैं।


न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ः किसान समय पर कर्ज की किस्त चुका सकें और भविष्य में कर्ज के लिए निर्भर न हों, इसके लिए एमएसपी का निर्धारण सी-2 के अनुसार हो, जिसमें पारिवरिक श्रम, जमीन का किराया और ब्याज को लागत में जोड़ा जाता है। सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि फसल एमएसपी से कम में न बिके। यानी न्यूनतम का मतलब न्यूनतम ही हो और इससे कम में खरीद करने वालों को दंडित करने का प्रावधान हो।


फसल बीमा ः चूंकि किसान कर्ज व्यक्तिगत स्तर पर लेते हैं, इसलिए बीमा दावे के लिए फसल के नुकसान का आकलन भी पूरे गांव के आधार पर नहीं, बल्कि किसानों को हुए व्यक्तिगत नुकसान के आधार पर हो। प्राकृतिक कारणों से फसल नुकसान की स्थिति में कर्ज में उसी अनुपात में छूट मिले।


किसान पेंशन ः पचास साल से अधिक समय से देश में जय जवान, जय किसान का नारा लग रहा है। जवानों को बीस वर्ष तक सेवा करने के बाद पेंशन मिलती है। इसी तरह से किसानों के लिए भी 20 वर्ष की सेवा के बाद पेंशन की व्यवस्था की जानी चाहिए।


गन्ना किसानों को भुगतान ः तीन करोड़ गन्ना किसान परिवारों के लिए बकाए का भुगतान न होना दशकों से एक बड़ी चिंता का कारण है। वैधानिक रूप से 14 दिनों में भुगतान होना चाहिए, लेकिन किसानों के बरसों के संघर्ष के बावजूद यह नहीं हो सका है। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए राकेट साइंस की जरूरत नहीं है। सरकार को भुगतान में देरी की स्थिति में 15 फीसदी का ब्याज लगा देना चाहिए। मिलों को बैंकों से 12 से 13 फीसदी की दर पर ब्याज मिलता है। जब उन्हें 15 फीसदी की दर से ब्याज देना पड़ेगा तो वह भुगतान नहीं रोकेंगी। आगामी चुनाव में इस पांच सूत्री एजेंडा को क्यों नहीं अपनाया जा सकता? पुलवामा में हुए आतंकी हमले के कारण 2019 में राष्ट्रवाद केंद्रीय मुद्दा बन गया है। क्या किसान देश की जो सेवा करते हैं, वह राष्ट्रवाद के दायरे में नहीं आता? यह चुनाव एक बड़ा अवसर है, जब किसानों की भी आवाज सुनी जाए।


-लेखक, ऑल इंडिया किसान संघर्ष कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक हैं

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