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पाकिस्तान : अंधी सुरंग में भटक रहे हैं इमरान खान

राजेश बादल
Updated Sat, 04 May 2019 10:27 AM IST
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इमरान खान (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

तो चीन ने भी आखिर पाकिस्तान को उसकी जगह दिखा दी। मसूद अजहर के मामले में अधिकतम सीमा तक उसने पाकिस्तान की सहायता कर दी। इसके आगे वह ऐसा हवन नहीं करना चाहता था कि उसके हाथ ही झुलस जाते। वन बेल्ट वन रोड चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी योजना है। जो देश उसमें चीन के साथ हैं , उनमें से कई भारत से भी अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहते। इसलिए बीते दिनों जब चीन में इस प्रोजेक्ट पर शिखर बैठक हुई तो अनेक देशों ने चीन से साफ-साफ कह दिया कि अगर चीन दुनिया में खुल्लमखुल्ला आतंकवाद को समर्थन देने वाले पाकिस्तान के साथ अपनी पींगें बढ़ाता रहा तो वे प्रोजेक्ट से हटना पसंद करेंगे, लेकिन भारत से रिश्ते नहीं बिगाड़ेंगे। 



रूस, श्रीलंका और ईरान ऐसे ही कुछ देश हैं, जबकि मलेशिया और टर्की पहले ही इस परियोजना से पल्ला झाड़ चुके हैं। शिखर बैठक से पहले ही चीन को यह संप्रेषित कर दिया गया था। इसी वजह से इमरान खान इस सम्मेलन से चंद रोज पहले जब चीन पहुंचे तो बेहद हताश, निराश और अलग थलग से थे। हद तो तब हुई, जब चीन पहुंचने पर उनकी अगवानी के लिए कोई नहीं पहुंचा। बीजिंग नगरपालिका का एक स्थानीय अधिकारी एयरपोर्ट पर उपस्थित था। पाकिस्तान के लोग इसे अपने मुल्क का अपमान मान रहे हैं ।


पाकिस्तान के मीडिया ने इस अपमान से दुखी होकर लिखा, भिखारियों के पास कोई विकल्प नहीं होता। समझा जाता है कि चीनी राजनयिकों ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को मसूद अजहर के मामले में आगे सहयोग नहीं दे पाने की अपनी मजबूरी बता दी थी। हिंदुस्तान के लिए अब ध्यान देने की बात यह है कि पाक अधिकृत कश्मीर को अलग करते हुए अगर चीन वन बेल्ट वन रोड का कोई वैकल्पिक रास्ता सुझाता है तो क्या भारत उसमें सहायता करने के लिए साथ आ सकता है। चीन यह भी जान गया है कि मौजूदा रास्ते पर भारत कभी भी साथ नहीं देगा। इसका अर्थ भारत के साथ सीमा विवाद के अलावा एक और नए विषय पर स्थायी तनाव का मोर्चा खुल जाना है। 


अपनी अंदरूनी आर्थिक हालत के चलते चीन अब कोई नया जोखिम नहीं उठाना चाहता। पाकिस्तान जैसे एक बेहद कमजोर मुल्क के लिए वह दुनिया के अनेक ताकतवर देशों का विरोध क्यों कर मोल लेना चाहेगा ? इनमें दक्षिण एशियाई देशों के अलावा रूस, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देश भी शामिल हैं। इन देशों के साथ भारत के गहरे कारोबारी संबंध हैं और उन्हें भारत से अच्छी खासी कमाई होती है। पाकिस्तान से तो आने वाले दस साल तक उन्हें कोई लाभ नहीं होने वाला है। उल्टे पाकिस्तान चीन की तरह उनके लिए भी एक परजीवी बेल बन जाएगा। ऐसे में भारत का साथ नहीं देकर अपने आर्थिक नुकसान का एक नया द्वार वे क्योंकर उठाएंगे ? 


इसके अलावा पाक अधिकृत कश्मीर में ग्वादर बंदरगाह तक जाने के लिए अगर चीन ने गलियारा बना भी लिया तो भारत के पास विरोध में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय जाने का रास्ता खुला है। अगर उस पर कोर्ट ने आवागमन की रोक लगा दी तो चीन का निवेश कोई भी रिटर्न नहीं दे पाएगा। लब्बोलुआब यह कि पाकिस्तान एक अंधी सुरंग में है। उससे बाहर निकालने का रास्ता हिन्दुस्तान के पास ही है। अगर आशा की इस किरण का वह सहारा नहीं लेता तो कटटरपंथी और आईएसआई मिलकर उसे इतिहास के कूड़ेदान में पहुंचाने का काम तो कर ही रहे हैं।  

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