भारतीय लोकतंत्र में सत्रहवीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव अनेक गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। इस चुनाव में प्रचार के दरम्यान घटिया और शर्मनाक तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है। निर्वाचन आयोग किसी को अड़तालीस घंटे के लिए प्रचार से रोक देता है, तो किसी को बहत्तर घंटे के लिए। किसी को रेड कार्ड दिखा कर नजरबंद कर देता है, तो किसी को कारण बताओ नोटिस जारी कर देता है। इससे अधिक कार्रवाई करने की इच्छा आयोग के वर्तमान सदस्यों में नहीं दिखाई देती। टी एन शेषन का जमाना शायद ही कभी लौटेगा।
सवाल यह है कि चुनाव दर चुनाव प्रचार के दौरान दरक रहे संयम के इस बांध को टूटने से कैसे रोका जाए? चुनाव आयोग से जब सर्वोच्च न्यायालय जवाब-तलब करता है, तो आयोग अपनी बेचारगी का रोना रोता है। जब अदालत फटकार लगाती है, तो दो चार दिन कड़क नजर आता है। ताज्जुब होता है कि क्या इसी चुनाव आयोग ने इंदिरा गांधी और उनकी सरकार को 1977 में बाहर का दरवाजा दिखाया था और क्या यह वही चुनाव आयोग है, जिसने पीवी नरसिंह राव की सरकार को दिन में तारे दिखा दिए थे?
खुद नेहरू सरकार ने महसूस किया था कि किसी भी निर्वाचित सरकार को अगले चुनाव में सरकारी संसाधनों का प्रचार के लिए उपयोग करने का नैतिक अधिकार नहीं है। वैसे तो पहले आम चुनाव में ऑल इंडियो रेडियो पर कांग्रेस समेत किसी भी दल को अपने प्रचार की खबरें या सूचनाएं प्रसारित करने की इजाजत नहीं थी। उस चुनाव में केवल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने रेडियो पर प्रचार की सुविधा पाई थी। यह सुविधा उसे सोवियत संघ के मॉस्को रेडियो ने दी थी। जब दो चुनाव हो गए और राजनीतिक दलों के बीच कड़वाहट पनपने लगी, तो जवाहर लाल नेहरू की पहल पर 1960 में सभी पार्टियों ने मिलकर एक आदर्श आचार संहिता को अंतिम रूप दिया। केरल के विधानसभा चुनाव में इसे पहली बार अमल में लाया गया। जब 1962 के लोकसभा चुनाव आए, तो आयोग ने इस आचार संहिता को परिष्कृत रूप में सभी दलों को वितरित किया। लोकसभा और विधानसभाओं के 1967 में चुनाव हुए, तो एक तरह से पहली बार यह आचार संहिता अमल में लाई गई।
जब 1979 में मध्यावधि चुनाव हुए, तो राजनीतिक माहौल बदला हुआ था। मुख्य चुनाव आयुक्त एस एल शकधर की अगुआई में चुनाव आयोग ने मजबूती दिखाई और सभी दलों से बात कर संहिता में एक नया हिस्सा जोड़ा। इसमें सत्तारूढ़ दल पर कुछ नई बंदिशें लगाईं गईं। मकसद यही था कि सरकार चला रही पार्टी को अन्य दलों की अपेक्षा शक्तियों के अधिक इस्तेमाल का अवसर न मिले। टी एन शेषन के कार्यकाल में आचार संहिता को और सख्त बनाया गया। इसमें साफ-साफ कहा गया है कि किसी की निजी जिंदगी पर हमला नहीं किया जाएगा, सांप्रदायिक आधार पर भावनाएं भड़काने वाली कोई अपील नहीं होगी। सरकारी कार्यक्रमों, नई नीतियों और फैसलों के एलान पर रोक लगाईं गई। प्रधानमंत्री- मंत्रियों के दौरे में सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल के दिशा-निर्देश भी बनाए गए।
विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट की मान्यता मिलने मात्र से इसे वैधानिक दर्जा नहीं मिल जाता। अगर कोई दल या उम्मीदवार संहिता तोड़ता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का कोई आधार नहीं है। इसी कारण पार्टी और प्रत्याशी धड़ल्ले से आचार संहिता तोड़ते रहे हैं। बेशक निर्वाचन का मामला अदालत में जाने से देरी होगी, मगर जब सभी पार्टियां इसे कानूनी रूप देने पर राजी हो जाएंगी, तो फिर इस तरह का प्रावधान भी जरूरी हो जाएगा कि ऐसे मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट निर्धारित समय सीमा के भीतर करके प्रकरण का निराकरण करें।