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विश्लेषण : जवाहिरी की हत्या में मददगार पाकिस्तान, फिर उजागर हुई तालिबान और आतंकियों से सांठगांठ

केएस तोमर
Updated Sun, 07 Aug 2022 07:08 AM IST

सार

रूस ने भी तालिबान प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया था। लेकिन जवाहिरी की हत्या ने तालिबान के मित्र देशों को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जो अब भी आतंकियों को पनाह देता है। कुल मिलाकर जवाहिरी की हत्या ने पूरी दुनिया के कूटनीतिक समीकरण को उलट दिया है।
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Al Qaeda Terrorist Al Jawahiri - फोटो : Amar Ujala


विदेश नीति विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद के लिए चार-आयामी रणनीति अपनाई होगी, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से सात अरब डॉलर का ऋण प्राप्त करने में अमेरिका की भूमिका का आश्वासन, जवाहिरी पर रखे गए 2.5 करोड़ डॉलर का इनाम पाना, एफएटीएफ की ग्रे सूची से मुक्ति और डूरंड रेखा पर परेशानी पैदा करने वाले तालिबान को सबक सिखाना शामिल होगा। 


इसलिए पाकिस्तान ने अमेरिका को खुफिया जानकारी प्रदान की, जिससे अमेरिका को सटीक हमला करने में मदद मिली और केवल जवाहिरी का खात्मा किया गया, बाकी अन्य किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ। इसने तालिबान शासन को दोहा समझौते के उल्लंघन के लिए कठघरे में खड़ा कर दिया है। समझौते में तालिबान ने प्रतिबद्धता जताई थी कि वे किसी भी आतंकी संगठन को किसी देश के खिलाफ अपनी जमीन का उपयोग नहीं करने देंगे, लेकिन उसका उल्लंघन किया गया और हक्कानी नेटवर्क ने जवाहिरी को काबुल में सुरक्षित पनाह दी। 


बाइडन के लिए अब तालिबान शासन के खिलाफ प्रतिबंधों को जारी रखने में आसानी हो सकती है, जिसे आईएमएफ, एडीबी आदि जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से वित्तीय सहायता नहीं मिल सकती, क्योंकि वे लगभग अमेरिका के इशारे पर काम करती हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने अफगानिस्तान के नौ अरब डॉलर के विदेशी भंडार पर रोक लगा दी है, विदेशी सहायता बंद कर दी है और तालिबान शासन पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिससे अफगानिस्तान के लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। 


यह जवाहिरी की हत्या के बाद भी जारी रह सकता है। जवाहिरी की हत्या को अंजाम देने में सहयोग मिलने के बाद अमेरिका पाकिस्तान की मदद कर सकता है। पाकिस्तान चीन की ओर झुक गया था, लेकिन उसे आर्थिक संकट से बाहर आने में चीन से ज्यादा वित्तीय सहायता नहीं मिली, इसलिए उसने आईएमएफ से कर्ज लेने के लिए अमेरिका की ओर रुख किया। लगता है, अमेरिका पाकिस्तान की भूमिका से संतुष्ट है और अब उसे आईएमएफ से कर्ज मिलना तय है। 


विश्लेषकों का मानना है कि तालिबान जिस तरह दुनिया के सामने अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रहा था और अपनी धरती से आतंकवादी गतिविधियों को संचालित नहीं होने देने का दावा कर रहा था, उस पर अब विश्वास करना मुश्किल होगा। इससे अंतरराष्ट्रीय पहचान पाने के लिए छवि निर्माण की तालिबान की कोशिशों को झटका लग सकता है। इससे भारत स्थित अलकायदा समर्थकों और सहयोगियों को भी झटका लगेगा, क्योंकि जवाहिरी भारतीय उपमहाद्वीप में अपना जाल फैलाने की कोशिश कर रहा था। 


अफगानिस्तान के लोगों को मानवीय सहायता प्रदान करते हुए तालिबान और अलकायदा के बीच उजागर हुई साठगांठ से भारत को चिंता होनी चाहिए। भारत को सुरक्षा पहलू को ध्यान में रखने की जरूरत है, क्योंकि तालिबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता, जिसके अधिकांश कैबिनेट मंत्री संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि अलकायदा के पास बुनियादी ढांचे और संसाधनों की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय हमलों की क्षमता नहीं है, लेकिन जवाहिरी की हत्या उन्हें बदला लेने के लिए उकसा सकती है, जिसमें भारतीय उपमहाद्वीप भी शामिल हो सकता है।
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अलकायदा ने म्यांमार, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश आदि से 4,000 से ज्यादा लड़ाकों की भर्ती की है। जवाहिरी ने भारत में वीडियो के माध्यम से अपने दुष्प्रचार को आगे बढ़ाया था, जिसका उद्देश्य मुसलमानों को जिहाद के लिए उकसाना था। इसलिए अब भारत को अपनी नीति पर फिर से विचार करना होगा, क्योंकि अलकायदा के आतंकवादियों को तालिबान का संरक्षण मिला है, जो हमारे लिए अच्छी खबर नहीं है, हालांकि जवाहिरी की हत्या ने उन्हें बैकफुट पर ला दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अलकायदा अपनी घटती शक्ति और अस्थिर भविष्य के कारण नेतृत्व और उत्तराधिकार के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। 


ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद ही कई चरमपंथियों के प्रतिद्वंद्वी समूहों में प्रतिद्वंद्विता सामने आई थी, और अफगानिस्तान में भी उनकी उपस्थिति पाई गई थी। संकेतों के अनुसार, मिस्र के सैफ अल-अदल, उन उम्मीदवारों में से एक है, जो अपने अनुभव, अलकायदा के भीतर प्रतिष्ठा और अन्य गुटों में चले गए लड़ाकों को वापस लाने की क्षमता रखता है। यह स्पष्ट है कि तालिबान शासन किसी भी नेता को आगे बढ़ाने में दो बार सोचेगा। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी पर पाकिस्तान ने जश्न मनाया था और चीन भी उसमें पीछे नहीं था। 


रूस ने भी तालिबान प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। लेकिन जवाहिरी की हत्या ने तालिबान के मित्र देशों को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जो अब भी आतंकियों को पनाह देता है। कुल मिलाकर जवाहिरी की हत्या ने पूरी दुनिया के कूटनीतिक समीकरण को उलट दिया है। भारत अलकायदा से जुड़े देशों से बचाव के लिए निवारक उपाय कर सकता है, जिससे तालिबान और भी अलग-थलग हो जाएगा।

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